कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ६७१ इसलिए मुझे अपनी युक्ति से पति के पास ही जाना चाहिए क्योंकि पतिव्रताओं के लिए पति ही इस लोक में और परलोक में गति है॥१०८॥ उसने ऐसा सोचकर वहीं तालाब में स्नान करके पूर्णरूप से राजपुत्र का वेश बनाया और बाजार में सोना बेचकर, उसका मूल्य लेकर उस दिन उसी नगर के किसी बनिये के घर में रात्रि व्यतीत की॥१०९॥ दूसरे दिन वल्लभी जाने के लिए उद्यत समुद्रसेन नामक वैश्य से उसने बात की और सेवक के साथ जाते हुए समुद्रसेन के साथ राजकुमार का वेष धारण की हुई कीर्तिसेना पहले गये हुए पति को प्राप्त करने के लिए वल्लभी को चली गई ॥११०-११२॥ अपना परिचय देती हुई वह उस वैश्य से कहने लगी कि 'कुटुम्ब के लोगों से तंग आकर तुम्हारे साथ अपने बान्धव व्यक्ति के पास जा रहा हूँ' यह सुनकर उस वैश्यपुत्र ने भी 'यह कोई कुलीन और भद्र राजपुत्र है' ऐसा समझकर मार्ग में उसकी यथोचित सहायता की ॥११३-११४॥ व्यापारी वैश्यों का वह दल मार्ग-शुल्क अथवा चुंगीकर की अधिकता से बचने के लिए उस मार्ग को छोड़कर अन्य जंगली मार्ग को पकड़कर, चलनेवाले अधिक व्यक्तियों के मार्ग से चला ॥११५॥ कुछ दिनों के पश्चात् वह दल घोर जंगल के मुहाने पर पहुँचकर ठहर गया। उसी समय यमराज की दूती के समान एक शृगाली ने भयंकर रूप से रोना प्रारम्भ किया ॥११६॥ उस अपशकुन को समझनेवाले वैश्य व्यापारियों ने चोर डाकुओं आदि के आक्रमण की शंका से सावधान होकर, रक्षकदल के सिपाहियों के शस्त्र लेकर तैयार हो जाने पर, शत्रुओं की प्रथम सेना-पंक्ति के समान अन्धकार के चारों ओर फैल जाने पर, पुरुषवेषधारिणी कीर्तिसेना सोचने लगी—॥११७-११८॥ पापियों के कर्म सन्तान द्वारा बढ़ते हैं। अर्थात् उनके पापों का फल सन्तान को भोगना पड़ता है। देखो सास द्वारा लाई गई विपत्ति इस समय मेरे प्रति फलित हो रही है ॥११९॥ मैं सबसे पहले मृत्यु के समान सास के क्रोध से खाई गई फिर दूसरे गर्भवास के समान तहखाने में बन्द की गई ॥१२१॥ दैववश पुनर्जन्म के समान वहाँ से निकली। अब आज यहाँ आकर पुनः जीवन के ही सन्देह में पड़ गई ॥१२२॥ यदि मैं चोर डाकुओं द्वारा मारी गई तो मेरी बैरिन सास मेरे पति से कहेगी कि वह किसी पर आसक्त होकर घर से निकल गई थी ॥१२३॥