कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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कीर्तिसेना ने कहा—'ठीक है।' तब वह ग्वाला पुरुष-वेशधारिणी कीर्तिसेना को वसुदत्त पुर में ले गया॥१६१॥ ग्वाले ने वहाँ जाकर दुःखित द्वारपाल से सब कुछ निवेदन किया और उस शुभलक्षणा को उसे सौंप दिया॥१६१॥ द्वारपाल ने भी राजा से निवेदन किया और उसकी आज्ञा से उस सर्वांगसुन्दरी को वह राजा के पास ले गया॥१६२॥ रोगाक्रान्त राजा वसुदत्त भी उस अद्भुत वैद्य को देखकर प्रसन्न और विश्वस्त हो गया॥१६३॥ 'यदि तुम मेरे इस रोग को दूर करोगे तो मैं तुम्हें इस राज्य का आधा भाग दे दूँगा॥१६४॥ स्वप्न में मैंने देखा है कि एक स्त्री मेरे शरीर पर से काला कम्बल हटा रही है। इससे समझता हूँ कि तुम निश्चय ही मेरी बीमारी दूर करोगे'॥१६५॥ यह सुनकर कीर्तिसेना कहने लगी—'राजन् आज तो दिन चला गया। अतः कल तुम्हारा रोग दूर करूँगा अधीर न होना'॥१६६॥ ऐसा कहकर उसने राजा के सिर पर गाय का घी मलवाया उससे उसे नींद आ गई और तीव्र वेदना कम हो गई॥१६७॥ 'वैद्य के रूप में यह कोई देवता आया है'—इस प्रकार कहकर सभी राजपुरुष उसकी प्रशंसा करने लगे॥१६८॥ महारानी ने भी अनेक प्रकार से उसका स्वागत-सम्मान किया और रात को उस वैद्य के लिए पृथक् सोने का प्रबन्ध कर दिया॥१६९॥ दूसरे दिन मध्याह्न में मन्त्रियों और राजाओं के सामने ही रादासी से भुनी हुई उस आश्चर्यजनक युक्ति से कीर्तिसेना ने कान के मार्ग से सभी चोचरों या कनखजूरों को बाहर निकाल दिया और घी-दूध आदि से राजा को हृष्ट-पुष्ट बना दिया॥१७०-१७२॥ समग्र राजा के रोगमुक्त और स्वस्थ होने पर और घड़े में उन जीवों को देखकर किसे आश्चर्य नहीं हुआ? ॥१७३॥