कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ७१९ यह सुनकर राजा ने कहा— 'मेरे मन में भी यही है। उसके बिना मैं घड़ी भर भी नहीं रह सकता' ॥१३॥ ऐसा कहकर उस मन्द स्वभाववाले राजा ने सामने खड़े हुए प्रधान द्वारपाल को आज्ञा देकर गणकों (ज्योतिषियों) को बुलवाया ॥१४॥ महामन्त्री द्वारा पहले से ही सिद्ध किये गये उन गणकों ने राजा के पूछने पर कहा कि 'महाराज के लिए यात्रा में छः महीने के बाद (पश्चात्) अनुकूल लग्न आता है' ॥१५॥ यह सुनकर कृत्रिम क्रोध प्रकट करता हुआ मन्त्री यौगन्धरायण 'ये मूर्ख हैं' ऐसा कहकर राजा से कहने लगा—"जिस गणक को महाराज ने 'ज्ञानी है'—तथा कहकर सम्मानित किया था वह आज नहीं आया। महाराज उसे बुलाकर पूछें" ॥१६-७॥ तब मन्त्री की बात सुनकर वत्सराज ने संताप—भर चित्त से उस ज्योतिषी को बुलवाया ॥१८॥ समय लाभ के षड्यन्त्र में मन्त्री यौगन्धरायण उसे भी पहले ही सम्मन्त्रित कर चुका था अतः उसने भी राजा के लग्न पूछने पर छह मास के पश्चात् का समय ही बतलाया ॥ ॥ तब व्याकुल भाव प्रकट करते हुए यौगन्धरायण ने राजा से कहा—'महाराज अब आदेश दीजिए कि क्या किया जाय' ॥१ ॥ उस विपत्तिकाल पर भी शुभ लग्न का चाहनेवाला राजा कुछ सोचकर कहने लगा— कलिंग सेना से भी पूछना चाहिए वह क्या सम्मति है देना ॥१२॥ 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर और गणकों को साथ लेकर मन्त्री यौगन्धरायण कलिङ्गसेना के पास गया ॥१३॥ उसके द्वारा स्वागत-सत्कार किया गया यौगन्धरायण उसके रूप को देखकर सोचने लगा कि इसे प्राप्त कर राजा दुःसह व्यसन में पड़ हुआ राज्य छोड़ देगा ॥१४॥ और उसने कहा — 'मैं तुम्हारा विवाह-लग्न स्थिर करने के लिए गणकों के साथ आया हूँ। अतः तुम अपना जन्म-नक्षत्र बताओ' ॥१५॥ कलिङ्गसेना के सेवकों द्वारा जन्म-नक्षत्र बताने पर पहले ही सम्मन्त्रित हुए गणकों ने अपना विचार प्रकट कहा कि 'लग्न छह महीने के पश्चात् मिलता है, इससे पूर्व नहीं। यही बात फिर उसने भी कही' ॥ १६॥