कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
Page 778 of 876
Read in contextषष्ठ लम्बक ७२१ कलिङ्गसेना के बहुत लम्बे समय बाद का लग्न सुन व्याकुल होने पर उसके प्रतीहार ने कहा—॥१७॥ 'सबसे पहले शुभ लग्न देखना चाहिए, जिससे कि उन दोनों (दम्पति) का कल्याण हो। विलम्ब और शीघ्रता का उतना महत्त्व नहीं ॥१८॥ वृद्ध प्रतीहार के वचन सुनकर सभी उपस्थित लोगों ने उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा कि इन्होंने ठीक ही तो कहा है॥१९ ॥ यौगन्धरायण ने भी कहा कि 'यदि अशुभ लग्न में विवाह हुआ तो हमारे सम्बन्धी कलिङ्गदत्त को भी खेद होगा' ॥२० ॥ तब कलिङ्गसेना भी विवश होकर बोली—'जैसा आप सब लोग उचित समझें करें'— इतना कहकर वह चुप हो गई ॥२१॥ कलिङ्गसेना की इस बात को सुनकर और उससे जाने की आज्ञा प्राप्त कर मन्त्री यौगन्धरायण गणकों के साथ राजा के पास गया ॥२२॥ वहाँ जाकर वत्सराज से उसी प्रकार सब निवेदन करके और उसे युक्तिपूर्वक समझा बुझाकर वह अपने घर गया ॥२३॥ समय व्यतीत करने की उसकी योजना सफल होने पर और अवशिष्ट कार्य की सिद्धि के लिए उसने अपने मित्र योगेश्वर नामक ब्रह्मराक्षस को बुलाया ॥२४॥ वह ब्रह्मराक्षस पहले से ही सिद्ध था अतः उसके ध्यान करते ही उपस्थित हो गया ॥२५॥ राक्षस ने मन्त्री को प्रणाम करते हुए पूछा कि 'मुझे क्यों स्मरण किया है'? ॥२६॥ तब मन्त्री यौगन्धरायण ने राजा को विरक्ति देनेवाले कलिङ्गसेना के समस्त वृत्तान्त को कहकर फिर कहा—'मित्र मैंने समय तो टाल दिया है। अभी छह् महीने हैं। इस बीच छिपे छिपे कलिङ्गसेना का हाल-चाल देखा ॥२७॥ विद्याधर सिद्ध आदि भी उसे निश्चित रूप से चाहते हैं। कारण यह कि तीनों लोकों में उसके समान सुन्दरी कुमारी नहीं है ॥२८॥ यदि वह किसी सिद्ध या विद्याधर के साथ सङ्गम करे तो तुम देखना इससे हमारा शुभ होगा ॥ ॥ रूप परिवर्तन कर आये हुए दिव्य प्राणियों का भी ध्यान रखना क्योंकि दिव्य व्यक्ति रूप परिवर्तित करने पर भी शयन करने के समय अपने वास्तविक रूप में आ जाते हैं ॥३० ॥ इस प्रकार तुम्हारी आँखों से हम उसके दोष देख सकेंगे। इससे राजा को उनके प्रति वैराग्य उत्पन्न हो जायगा और हमारा कार्य सिद्ध हो जायगा ॥३१॥ ९१