कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ७३१ सोमप्रभा ने कौशाम्बी में इस प्रकार कथा सुनाकर कलिंगसेना से पुनः कहा— ईर्ष्यालु इस प्रकार काम में लगे हुए लोगों को आनेवाले अपशकुन कार्यों में व्यवधान उत्पन्न कर देते हैं। इस कारण बुद्धिमानों की बातों को न माननेवाले मन्दबुद्धिवाले व्यक्ति आवेश में आकर कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं और पीछे पश्चात्ताप करते हैं। इसलिए उस अपशकुन में वत्सराज के प्रति तुमने अपने ग्रहण करने के लिए, जो दूत भेजा वह अच्छा नहीं किया। तू घर से कुलग्न में आई है इसलिए तेरा विवाह टल गया है। अब दैव ही उसे निर्विघ्न पूर्ण करे ॥९०-९४॥ गुण पर देवता भी रीझते हैं। इसलिए तुम्हें उसकी रक्षा करनी चाहिए और मन्त्री यौगन्धरायण की भी चिन्ता करनी चाहिए। राज्य पर विपत्ति की आशंका से वह विवाह में विघ्न उपस्थित करेगा। विवाह हो जाने पर भी वह तुममें दोष उत्पन्न करेगा। धार्मिक होने पर यह संभव है कि वह तुम्हें लांछित न करे, तो भी तुम्हारी सौतें चिन्तनीय हैं। मैं इस प्रसंग में तुम्हें कथा सुनाती हूँ सुनो ॥९५ ९७॥ ऋषिकन्या कदलीगर्भा की कथा छेदी देश में इषुमती नाम की नगरी है। उसके पास ही इषुमती नाम की नदी है। ये दोनों नगरी और नदी—मुनि विश्वामित्र-निर्मित हैं॥९८॥ उसके तट पर एक महान् वन है जिसमें मंकणक नाम का ऋषि ऊपर पैर करके तपस्या करता था॥९९॥ तपस्या करते हुए उसने एक बार आकाश-मार्ग से जाती हुई मेनका नाम की अप्सरा को देखा। आकाश-मार्ग से जाती हुई उस मेनका की साड़ी वायु से उड़ रही थी। अतः, उसे नग्न देखने के कारण काम-वासना से ऋषि का मन क्षुब्ध हो उठा। फलतः उस ऋषि का वीर्य एक नवीन कदली-वृक्ष के मध्य जा गिरा। और उस कदली-गर्भ से सर्वाङ्गसुन्दरी एक कन्या उत्पन्न हुई क्योंकि ऋषियों का अमोघ (सफल) वीर्य शीघ्र ही फलीभूत होता है॥१००-१ २॥