BharatKosha
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

Page 794 of 876

Read in context
Page 794

षष्ठ लम्बक ७३५ 'और बेटी कभी पति के अपमान करने पर तू यदि पिता के आश्रम को लौटेगी तो इन्हीं सरसों के वृक्षों से मार्ग का पता लग जायगा' ॥११८॥ उनसे इस प्रकार कही गई कन्या कदलीगर्भा को घोड़े पर बैठाकर राजा दृढ़वर्मा अपने नगर को लौटा ॥११९॥ राजा के पीछे सेना भी आ रही थी। इस प्रकार सरसों बोती हुई उस कन्या को लिये हुए वह राजा अपनी राजधानी में आ गया ॥१२० ॥ वहाँ आकर राजा ने मन्त्रियों से अपना सारा विवाह-वृत्तान्त प्रकट कर दिया और अन्य रानियों से विरक्त होकर वह एकमात्र कदलीगर्भा के ही प्रेम में मग्न हो गया ॥१२१॥ तदनन्तर उसकी महारानी ने राजा के मन्त्री को बुलाकर और अपने किये हुए उपकारों का स्मरण दिलाकर, उससे एकान्त में कहा—'ऐसा उपाय करो कि जिससे मेरी यह सौत चली जाय क्योंकि वह (राजा) एकमात्र उसी में आसक्त है' ॥१२२-१२३॥ यह सुनकर मन्त्री कहने लगा—महारानी स्वामी की पत्नी का इस प्रकार विनाश या वियोग मेरे जैसे व्यक्ति नहीं कर सकते' ॥१२४॥ यह तो साधुनी स्त्रियों या जादू-टोना करनेवाले ऐसे-वैसे व्यक्तियों का काम है ॥१२५॥ ये मायाकुशल नकली साधुनियाँ अपनी अप्रतिहत गति से घरों में घुसकर यह सब मायाजाल रचा करती हैं। वे क्या-क्या नहीं करतीं ? ॥१२६॥ मन्त्री के इस प्रकार कहने पर रानी अत्यन्त लज्जा से विनम्र होकर कहने लगी—'तो इस प्रकार के सज्जनों द्वारा निन्दित कार्य से मुझे क्या प्रयोजन' ॥१२७॥ इस प्रकार मन्त्री को विदा कर और उसकी बात को मानकर रानी ने दासी द्वारा किसी साधुनी को बुलवाया ॥१२८॥ रानी ने उसे अपनी सारी कामना बता दी और कार्य सिद्ध होने पर उसे पर्याप्त धन देने का आश्वासन भी दिया ॥१२९॥ वह दुष्टा परिव्राजिका (साधुनी) भी धन के लोभ से उस व्याकुल रानी से बोली— 'महारानी यह कौन-सी बात है इसे तुरन्त सिद्ध करती हूँ' ॥१३० ॥ मैं विविध प्रकार के प्रयोगों को जानती हूँ। इस प्रकार रानी को धीरज बँधाकर वह परिव्राजिका चली गई और अपनी मटिया में जाकर डरी हुई-सी इस प्रकार सोचने लगी— मुझे भाग्य से ही यह प्राप्ति का अवसर मिला है। लोगों की अत्यन्त लुब्धा विनती दुर्दशा नहीं करती ? आश्चर्य है। ॥१३१-१३२॥