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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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षष्ठ लम्बक ७३९ उसने अपने सेवकों से यह जान लिया कि यह नापित की स्त्री है, 'नापित मेरा क्या करेगा'—यह जानकर वह मेरे घर में घुस आया और स्वतन्त्रतापूर्वक मेरी स्त्री को भ्रष्ट करके वह दुष्ट राजा चला गया। मैं दैवयोग से उस दिन घर से कहीं बाहर गया हुआ था ॥१४८-१४९॥ दूसरे दिन घर आते ही मैंने उसे (अपनी स्त्री को) दूसरी स्थिति में देखा और पूछने पर उसने अभिमान से सारा वृत्तान्त कह दिया ॥१५०॥ तब से मुझे रोकने में असमर्थ जानकर मेरी परवाह न कर, वह राजा नित्य ही मेरी स्त्री का उपभोग करता रहा ॥१५१॥ दुश्चरित्राता के कारण पापक स्वामी (राजा) के लिए गम्य और अगम्य क्या है ? वाय से फैलाई गई आग के लिए तिनका और जंगल समान है ॥१५२॥ जब मैंने देखा कि राजा को रोकने के लिए मेरी कोई गति नहीं है तब स्वल्पाहार सं पूर्वक होकर मैंने माँदगी (रोग) का बहाना किया ॥१५३॥ इस प्रकार दुबला-पतला रोपी का-सा मुँह किये मैं दुख भरी लम्बी साँस लेता हुआ क्षौर कर्म की सेवा के लिए राजा के पास गया ॥१५४॥ मुझे इस प्रकार माँदा (रोगी) देखकर राजा ने अभिप्राय से पूछा— क्यों रे ! बता तू इतना दुर्बल क्यों हो गया है ? ॥१५५॥ उसके बार-बार आग्रहपूर्वक पूछने पर मैंने अभय-याचना करके उससे एकान्त में कहा—'महाराज क्या कहूँ मेरी स्त्री डाकिनी है। वह सोये हुए में मेरी आँतों का मलद्वार से बाहर खींचकर चूस लेती है और फिर उसी प्रकार रख देती है। इसी कारण मैं दुर्बल हो गया हूँ ॥१५६-१५७॥ शरीर को पुष्ट रखने के लिए मेरे पास पौष्टिक भोजन कहाँ से आवे ? मेरे ऐसा कहने पर राजा सोचने लगा—'क्या वह सचमुच डाकिनी है ? तभी उसने मुझे आकृष्ट कर रखा है। तो अब उपाय से आज रात को उसका पता लगाऊँगा। क्या आहार से परिपुष्ट मेरी आँतों को भी वह चूसेगी ? तब मैं राजा के द्वारा आहार प्राप्त कर अपने घर आकर आँसू बहाने लगा और अपनी स्त्री द्वारा कारण पूछे जाने पर मैंने कहा—'प्यारी किसी से कहना मत। सुनो, तुम्हें बताता हूँ। उस राजा के मलद्वार में वज्र के समान दाँत निकल आये हैं ॥१५८-१६२॥