कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ४७३ तदनन्तर रात में सभी मनुष्यों के सो जाने पर वत्सराज और यौगन्धरायण कलिङ्गसेना के निवास-भवन में गये। और असंकित रूप से सोए हुए मदनवेग के वास्तविक स्वरूप को उन्होंने देखा ॥१९३ १९४॥ जबतक राजा उस साहसी मदनवेग को मारने के लिए तलवार खींचता है, तबतक वह जगकर अपनी विद्या के प्रभाव से विद्याधर बन गया ॥१९५॥ और शीघ्र ही उठकर एवं भवन से बाहर निकलकर आकाश में उड़ गया। इतने में ही कलिङ्गसेना भी सहसा उठ गई ॥१९६॥ वह अपने पर्यङ्क को सूना देखकर बोली—'मुझे बिना जगाये ही स्वयं पहले जाकर आज वत्सराज क्यों चले गये ? ॥१९७॥ यह सुनकर यौगन्धरायण ने वत्सराज से कहा—'सुनो ! इस विद्याधर ने तुम्हारा रूप धारण करके इसे भ्रष्ट कर दिया है। यह मैंने योगबल से जानकर तुम्हें प्रत्यक्ष दिखा दिया किन्तु वह दिव्यशक्तिशाली है। तुम उसे मार नहीं सकते। ऐसा कहकर राजा और मन्त्री दोनों प्रत्यक्ष होकर कलिङ्गसेना के पास पहुँचे। कलिङ्गसेना भी उन्हें देखकर उनका समुचित सत्कार करती हुई उठकर खड़ी हुई ॥१९८-२ ॥ और कहने लगी 'राजन् ! अभी ही जाकर फिर आप मन्त्री के साथ कैसे पधारे !' ऐसा कहती हुई कलिङ्गसेना से मन्त्री यौगन्धरायण बोला—॥२ १॥ हे कलिङ्गसेना ! तुझे किसी शठ व्यक्ति ने वत्सराज का रूप धारण करके भ्रम में डालकर विवाहित कर लिया। तेरे इस स्वामी से तू विवाहित नहीं हुई है ॥२ २॥ यह सुनते ही मानों तीर से विदीर्ण हृदय अतएव अत्यन्त व्याकुल कलिङ्गसेना आँसू बहाती हुई वत्सराज से कहने लगी—॥२ ३॥ गान्धर्व विधि से विवाहितकर कल पर आपने मुझे वैसे ही भुला दिया जैसे दुष्यन्त ने शकुन्तला को भुला दिया था। यह क्या है ? ॥२ ४॥ कलिङ्गसेना के इस प्रकार कहने पर राजा ने नीचे मुँह किये हुए कहा—'सत्य है, मैंने तुझे विवाहित नहीं किया। मैं तो आज ही यहाँ आया हूँ' ॥२ ५॥ ऐसा कहते हुए राजा को मन्त्री यौगन्धरायण 'आइए' तथा कहकर राजभवन में ले गया ॥२ ६॥