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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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षष्ठ लम्बक ७८५ राजा के इस प्रकार कहने पर मन्त्री यौगन्धरायण ने कहा—'महाराज सुना जाता है कि कामदेव के दग्ध हो जाने पर उसकी पत्नी रति ने तपस्या की कि मर्त्यलोक में अनङ्ग सशरीर कामदेव से मेरा समागम हो। तपस्या से प्रसन्न होकर अपने पति को चाहती हुई रति को वर दिया कि तू भी मनुष्य-योनि में जन्म लेकर अपने पति से मिलेगी ॥ ९६ ॥ पहले ही दिव्यवाणी ने तुम्हारे पुत्र को कामदेव का अवतार घोषित किया है। यह कन्या भी शिवजी की आज्ञा से रति के अवतार-रूप में उत्पन्न हुई है। यह बात प्रत्यक्ष करानेवाली धात्री ने एकान्त में मुझसे कही है ॥९१-९२॥ उसने बताया कि मैंने कलिङ्गसेना के गर्भ को पहले शय्या पर देखा था उसी समय उस अनिर्वचनीय रूप में देखा ॥९३॥ उस आश्चर्य को देखकर ही मैं तुम्हें कहने आई हूँ। इस प्रकार उस स्त्री ने मुझसे कहा और मेरी बुद्धि भी यही कहती है। अतः मैं समझता हूँ कि देवमाया ने अपनी माया के प्रभाव से उस रूपशालिनी रति को कन्या बनाकर यहाँ रख दिया और वास्तविक गर्भ को तिरोहित कर दिया है ॥९४-९५॥ यही कन्या कामदेव के अवतार तुम्हारे पुत्र नरवाहनदत्त की पत्नी है। इस सम्बन्ध में मैं एक यक्ष की कथा कहता हूँ सुनो ॥९६॥ विकतानन्द नामक एक यक्ष कुबेर का भृत्य था। वह अगणित खजानों का प्रधानाध्यक्ष बन गया ॥९७॥ उसने मथुरा नगरी के बाहरी भाग में स्थित एक खजाने की रक्षा के लिए यमदूत के सादृश्य के समान एक यक्ष को नियुक्त किया ॥९८॥ किसी समय उस नगरी का निवासी खजाने को जाननेवाला एवं दूसरा खजाना खोजने के लिए बार-बार भूमि की परीक्षा करने लगा। परीक्षा करते हुए उसके हाथ का कञ्चन की चाँदी से बनी हुई बत्ती एक स्थान पर गिर पड़ी ॥९९-१००॥ उस लक्षण से कपतान ने उसी स्थान पर खजाने का होना निश्चित करके अपने अन्य धनदत्त मित्रों के साथ खजाना खोदना आरम्भ किया ॥१०१॥ यह यक्ष रात में उस गुप्त निधि की रक्षा के लिए नियुक्त था उसने अविलम्ब विकतानन्द से यह समाचार कहा ॥१०२॥ मंत्री विकतानन्द के गुप्त बात के सम्बन्धी विचार करने पर जब तक यमदूत-सदृश दूतों को खजाना दिलाने के कहने ही वाला था ॥१०३॥