कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ७९३ राजा द्वारा इस प्रकार युवराज के मन्त्रियों के नियुक्त किये जाने पर आकाश से पुष्पवृष्टि के साथ दिव्यवाणी हुई कि 'ये सभी मन्त्री इसके अभिन्नहृदय मित्र होंगे किन्तु गोमुख इसके शरीर से भी भिन्न न होगा' ॥११७-११८॥ इस प्रकार दिव्यवाणी से कहा गया वत्सराज अत्यन्त प्रसन्न हुआ और वस्त्र-आभूषण आदि से उसने सबका सम्मान किया ॥११९॥ उस राजा उदयन के सेवकों पर धन की वर्षा करने पर दरिद्र शब्द के केवल अर्थ की ही संगति नहीं रही¹ ॥१२० ॥ वायु द्वारा आन्दोलित अतएव फड़फड़ाती हुई पताकाओं के वस्त्रों की पंक्ति से मानो यह नगरी निमन्त्रित नर्तकियों और चारणों से भर गई थी ॥१२१॥ होनेवाले कलिङ्गसेना के जामाता के इस महोत्सव में मानो विद्याधरों की राजलक्ष्मी स्वयं आ गई ॥१२२॥ तदनन्तर रानी वासवदत्ता पद्मावती तथा कलिङ्गसेना ये तीनों मिलकर सम्मिलित धत्तियों के समान नाचने लगी ॥१२३॥ वायु द्वारा आन्दोलित लताएं चारों ओर नृत्य कर रही थीं और उद्यानों के वृक्ष इस नृत्य में भाग ले रहे थे। चेतन प्राणियों की तो बात ही क्या है ? ॥१२४॥ अभिषिक्त युवराज नरवाहनदत्त जयकुंजर पर चढ़कर बाहर निकला और नागरिक स्त्रियों के नीलकमल रूपी-लावे (धान के खीलों) की अंजुलियों के समान नील श्वेत और लाल नेत्रों से ढक दिया गया ॥१२५ १२६॥ युवराज सवारी से मयर-देवता का दर्शन करता हुआ एवं बन्दियों और सूतों से स्तुति किया जाता हुआ अपने मन्त्रियों के साथ युवराज-भवन में गया ॥१२७॥ वहां पर सबसे पहले कलिङ्गसेना ने अपने वैभव से भी बढ़कर भोजन-पान की दिव्य वस्तुओं से उनका स्वागत किया और जामाता के स्नेह से गद्गद होकर विविध प्रकार के वस्त्र और आभूषण मन्त्रियों-सहित युवराज को दिये ॥१२८ १२९॥ इस प्रकार, अमृतास्वाद के समान सुन्दर महोत्सव का यह दिवस वत्सराज आदि सबने सुख के साथ व्यतीत किया ॥१३० ॥ रात होने पर कन्या के विवाह के लिए विचार-विमर्श करने के लिए कलिङ्गसेना ने अपनी प्राणप्यारी सखी सोमप्रभा का स्मरण किया ॥१३१॥ १ अर्थात् राज्य में कोई दरिद्र न रह गया।—अनु १