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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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षष्ठ लम्बक ७१५ कलिङ्गसेना द्वारा स्मरण की गई मयासुर की कन्या सोमप्रभा को उसके महाज्ञानी पति नलकुबर ने कहा—॥१३२॥ 'प्यारी आज कलिङ्गसेना अत्यन्त उत्कण्ठा से तेरा स्मरण कर रही है इसलिए जाओ और उसके लिए दिव्य उद्यान बनाओ' ॥१३३॥ ऐसा कहकर और कलिङ्गसेना के सम्बन्ध में भूत और भविष्य का वर्णन करके सोमप्रभा को उसके पति ने तुरन्त भेज दिया ॥१३४॥ वह सोमप्रभा भी आकर चिर-उत्कंठा से गल मिलती हुई कलिङ्गसेना से कुशल-समाचार पूछने के उपरान्त कहने लगी—॥१३५॥ 'तू अत्यन्त धनी विद्याधर के साथ विवाहित हुई है और शिवजी की कृपा से तेरे यहाँ रति ने अवतार लिया है ॥१३६॥ तेरी यह कन्या वत्सराज के यहाँ उत्पन्न हुए कामदेव के अवतार नरवाहनदत्त की पूर्व जन्म की पत्नी है ॥१३७॥ वह नरवाहनदत्त दिव्य कल्प वर्षों तक विद्याधरों पर राज्य करेगा और तुम्हारी कन्या उसके यहाँ के स्त्री-समाज में सर्वमान्य और सम्राज्ञी बनी रहेगी ॥१३८॥ तू भी इन्द्र के शाप से भूलोक में पतित पूर्व जन्म की अप्सरा है और कुछ शेष कार्यों को समाप्त करके मुक्ति प्राप्त करेगी ॥१३९॥ हे सखि यह सब मेरे ज्ञानी पति ने मुझे बताया है। और मैं तुम्हारी कन्या के लिए एक उद्यान बना देती हूँ। ऐसा उद्यान पाताल पृथ्वी और स्वर्ग में कहीं भी नहीं होगा' ॥१४०-१४१॥ ऐसा कहकर और अपनी माया से दिव्य उद्यान का निर्माण करके उत्कण्ठित कलिङ्गसेना से पूछकर सोमप्रभा चली गई ॥१४२॥ तदनन्तर प्रातःकाल होते ही लोगों ने उस उद्यान को इस प्रकार देखा मानो स्वर्ग का नन्दन-वन अकस्मात् यहाँ उतर पड़ा हो ॥१४३॥ इस समाचार को सुनकर वत्सराज अपनी पत्नियों और मन्त्रियों-सहित वहाँ आया। युवराज नरवाहनदत्त भी अपने साथियों के साथ वहाँ गया ॥१४४॥ राजा ने वहाँ उस उद्यान को देखा जिसमें सदा फल और फूल देनेवाले वृक्ष लगे हुए थे। विविध प्रकार के मणिरत्न-समूहों द्वारा चबूतरा और बावलियों से वह शोभित था। उसमें स्वर्णिम पक्षी विहार कर रहे थे। दिव्य सुगन्धवाली वायु बह रही थी। यह सब देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि मानो देवताओं की आज्ञा से पृथ्वी पर दूसरे स्वर्ग का निर्माण किया गया हो ॥१४५-१४६॥