भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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षष्ठ लम्बक ८१ आश्चर्य है कि ब्रह्मा ने पहले साहस को उत्पन्न किया और उसके पश्चात् ही स्त्रियों को। इन स्त्रियों के लिए स्वभावतः कुछ भी कर डालना कठिन नहीं है। स्त्री की सृष्टि अवश्य ही अमृत और विष दोनों से की गई है, यद्यपि वही स्त्री अनुरक्त होने पर अमृत के समान और विरक्त होने पर विष के समान हो जाती है॥१७७-१७८॥ बाहर से देखने में सुन्दर और गुप्त रूप से पाप करनेवाली स्त्री उस बावली के समान है जिसमे जल के ऊपर तो कमल खिले हों और भीतर भीषण मगर तथा हिंसक जन्तुओं से पूर्ण हो॥१७९॥ कोई ही गुणवती और सुभगी सूर्य की निर्मल प्रभा के समान स्वर्ग से आती है, जो पति का गुणगान करनेवाली होती है॥१८०॥ पति के प्रति विरक्त और पर-पुरुषों पर वासक्त एवं वैराग्य-रूपी विष से भरी हुई स्त्री नागिन के समान अपने पति का विनाश कर देती है॥१८१॥ शत्रुघ्न और उसकी दुष्टा स्त्री की कथा इसी प्रकार, किसी गाँव में शत्रुघ्न नाम का एक पुरुष रहता था और उसकी स्त्री व्यभिचारिणी थी॥१८२॥ उसने एक बार सन्ध्या के समय अपनी स्त्री को उसके प्रेमी से मिलते देखा और देखकर उसने घर के भीतर बैठे हुए उस स्त्री के यार को तलवार से मार दिया और रात की प्रतीक्षा में वह अपनी पत्नी को रोककर बैठा रहा। इतने ही में निवास-स्थान का इच्छुक कोई बटोही वहाँ उसके पास आया॥१८३-१८४॥ शत्रुघ्न उस पथिक को स्थान देकर और युक्तिपूर्वक उसे भी मारकर, उस व्यभिचारिणी को लेकर जंगल में चला गया॥१८५॥ जंगल में जाकर जब वह उस शव को एक अँधेरे कुँए में फेंकने लगा इतने ही में पीछे से आती हुई उसकी स्त्री ने उसे भी उसी कुँए में ढकेल दिया॥१८६॥ इस प्रकार दुष्टा स्त्री कौन-सा साहसिक कार्य नहीं कर सकती। गोमुख ने बालक होते हुए भी इस प्रकार स्त्री चरित्र की निन्दा की॥१८७॥ तदनन्तर वह नरवाहनदत्त वहाँ पर नागों की पूजा करके अपने परिवार और साथियों सहित अपने निवास-स्थान पर लौट आया ॥१८८॥ राजनीति का सार एक दिन जिज्ञासु नरवाहनदत्त ने जानते हुए भी अपने मन्त्रियों से राजनीति का सार पूछा॥१८९॥ १. यह नीति-वर्णन कामन्दकनीति शुक्रनीति, मनु और याज्ञवल्क्य आदि ग्रन्थों के अनुसार है। विशेष विवरण संस्कृत-टिप्पणी में देखिए।-अनु. ११