भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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षष्ठ लम्बक ८७ तब नरवाहनदत्त अपने उन साथियों के साथ चिरकाल से उत्कण्ठित प्रिया मदनमंचुका को देखने के लिए गया ॥२१५॥ उसके निवास-स्थान पर पहुँचते ही आसन पर बैठकर स्वागत-सत्कार करती हुई विस्मित कलिङ्गसेना गोमुख से कहने लगी—॥२१६॥ 'गोमुख राजकुमार नरवाहनदत्त के यहाँ न आने पर, अर्थात् उनके आने से पूर्व उनके आने की प्रतीक्षा में उत्कण्ठिता मदनमंचुका भवन के ऊपर की छत पर चढ़ी और उसके पीछे मैं भी गई। इतने में ही एक दिव्य मुकुटधारी पुरुष आकाश से उतरा ॥२१७-२१८॥ उसके हाथ में तलवार थी और सिर पर किरीट था। उस दिव्य पुरुष ने मुझसे कहा— 'मैं मानसवेग नामक विद्याधरों का राजा हूँ ॥२१९॥ तू शाप से पतित सुरभिला नाम की स्वर्गीय स्त्री है। तुम्हारी कन्या भी दिव्य स्त्री है। यह मुझे ज्ञात है ॥२२० ॥ इसलिए तू इस कन्या को मुझे दे दे। उसका और मेरा यह सम्बन्ध योग्य है। उसके इस प्रकार कहने पर मैंने हँसकर कहा—॥२२१॥ देवताओं द्वारा पहले से ही निश्चित किया गया नरवाहनदत्त इसका पति हो चुका है। वह तुम सब विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा ॥२२२॥ मेरी कन्या को ले जाने के लिए आरम्भित उसकी बिजली के समान मुझसे इस प्रकार कहकर वह विद्याधर आकाश में उड़ गया ॥२२३॥ यह सुनकर गोमुख बोला— हमारा यह राजकुमार नरवाहनदत्त जब उत्पन्न हुआ था तभी आकाशवाणी ने सूचना दी थी कि वह विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा होगा। इसलिए उसे अपना भावी राजा समझकर विद्याधरगण उसे नष्ट करने का प्रयत्न कर रहे हैं। किन्तु कोई भी दुष्ट बलवान् विधि के विधान के विरुद्ध कुछ नहीं कर सकता। भगवान् शंकर ने उसकी रक्षा के लिए गण को नियुक्त किया है ऐसा नारद मुनि ने यह पिता से कहा है और उनसे मैंने सुना है ॥२२४-२२६॥ इसीलिए ये विद्याधर इस समय हमारे विरोधी बने हुए हैं। इतना कहकर कलिङ्गसेना अपने रोते हुए दामाद के रूप में बातें — दर्प भले ही समाप्त मदनमंचुका सहित नहीं की उन्होंने या हँसी नहीं जाती है गोमुख ही समझदार उपाय कर उसने विचार कर कार्य नष्ट कर दिया गया ॥२२७-२२८॥ कलिङ्गसेना की बातें सुनकर दामाद आदि कहने लगे कि इस कार्य के लिए शीघ्र ही वासवदत्त को सूचित करो ॥ ॥