कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ८११ नरवाहनदत्त और मदनमंचुका का विवाह वत्सराज ने अपने साथियों-सहित इस प्रकार भगवद्वाणी को सुनकर उसे प्रणाम किया और पुत्र के विवाह के लिए आनन्द के साथ निर्णय किया॥२४६॥ तदनन्तर वत्सराज ने सारी वास्तविक स्थिति को समझनेवाले मुख्यमन्त्री यौगन्धरायण का अभिनन्दन करके और ज्योतिषियों को बुलाकर शुभफल देनेवाला विवाह-लग्न पूछा और समुचित दक्षिणा आदि से पुरस्कृत ज्योतिषियों ने कुछ ही दिनों में विवाह-लग्न निश्चित कर दिया॥२४७॥ ज्योतिषियों ने कहा—'महाराज आपका यह पुत्र कुछ दिनों तक इस पत्नी के वियोग का कष्ट झेलेगा यह हमलोग शास्त्र की दृष्टि से जानते हैं॥२४८॥ तदनन्तर राजा ने अपने वैभव के अनुसार पुत्र के विवाह की तैयारी आरम्भ की। उसकी तैयारी के उद्योग से केवल कौशाम्बी नगरी में ही नहीं प्रत्युत सारी पृथ्वी में हलचल मच गई॥२४९॥ विवाह का दिन आने पर कन्या के पिता मदनवेग द्वारा दिये गये वस्त्र और अलंकारों से माता कलिङ्गसेना ने और पति की आज्ञा से आई हुई कलिङ्गसेना की सखी सोमप्रभा ने कन्या मदनमंचुका को विवाहोचित रूप में सुसज्जित कर दिया॥२५०॥ दिव्य सामग्री से अलंकृत मदनमंचुका इतनी सुन्दर लग रही थी जैसे कात्तिक मास (शरदऋतु) में चन्द्रमा शोभित होता है॥२५१॥ शिवजी की आज्ञा से आयी हुई दिव्य स्त्रियाँ मदनमंचुका के रूप से पराजित होकर अतएव लाज से छिपकर मानों मंगल-गान कर रही थीं॥२५२॥ भक्तों पर दया करनेवाली हे पार्वती ! तुम्हारी जय हो। तुमने आज स्वयं उपस्थित होकर रति के तप को सफल किया'—इत्यादि वाक्यों से वे देवी की स्तुति करने लगीं और गन्धर्व गण वाद्य-ध्वनि करने लगे॥२५३॥ वर के वेष में सुसज्जित अतएव शोभित नरवाहनदत्त वाद्यों की ध्वनि से मुखरित और मदनमंचुका से अलंकृत विवाह-मंडप में प्रविष्ट हुआ॥२५४॥ बड़े-बड़े विद्वान् ब्राह्मणों द्वारा विवाह-विधि को सम्पन्न करके वर और वधू राजा के किरीट-स्थित निर्मल रत्नदीपों के समान देदीप्यमान अग्नि की प्रदक्षिणा के लिए वेदी के निकट गये॥२५५॥