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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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प्रथम लम्बक ५५ तब व्याडि ने कहा—'हे राजन् ! यह शरीर क्षण-भर में नष्ट हो जानेवाला है। अतः कौन बुद्धिमान् इस अनित्य सुख भोगों में डूबता है ॥१३३॥ लक्ष्मी की मृगतृष्णा किस धीर-पुरुष को मोहित नहीं कर लेती'? ऐसा कहकर तपस्या के लिए निश्चय किए हुए वह व्याडि उसी समय चला गया ॥१३४॥ वररुचि कहता गया—'हे काणभूते ! इसके अनन्तर योगनन्द अयोध्या-शिविर से समस्त सेना के सहित मेरे साथ चलकर प्रधान राजधानी पाटलिपुत्र में राज-भोग करने के लिए आ गया ॥१३५॥ इस प्रकार, पाटलिपुत्र में आकर उपकोशा द्वारा मेरी सेवा होती थी। और, साथ ही राजा नन्द के मन्त्रित्व-भार को वहन करता हुआ मैं माता और सुहृज्जनों के साथ समृद्धि का उपभोग करने लगा ॥१३६॥ पाटलिपुत्र में तपस्या से प्रसन्न होकर गंगाजी मुझे प्रतिदिन बहुत-सा सुवर्ण देती थीं और साक्षात् शरीरधारिणी सरस्वती मेरे कार्यों में सर्वदा स्वयं सम्मति देती रहती थीं ॥१३७॥ महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का चतुर्थ तरंग समाप्त। पञ्चम तरंग वररुचि की कथा (चालू) वररुचि का वैराग्य ऐसा कहकर वररुचि ने फिर कहना प्रारम्भ किया कि कुछ समय के अनन्तर योगनन्द काम क्रोध आदि के वशीभूत हो गया ॥१॥ वह योगनन्द गजेन्द्र के समान उन्मत्त हो गया और उसे कुछ भी न सूझता था। आकस्मिक रूप में प्राप्त हुई लक्ष्मी किसे उन्मत्त नहीं बना देती ॥२॥ तब मैंने सोचा कि राजा अनियन्त्रित स्थिति में हो रहा है। इसके कार्यों की चिन्ता में व्याकुल होकर मेरा कर्तव्य भ्रष्ट हो रहा है। अतः अपनी सहायता के लिए क्यों न शकटाल का उद्धार करूँ? यदि वह राजा के विरुद्ध आक्रमण करेगा भी तो मेरे रहते क्या कर सकता है ॥३ ४॥ इसलिए मैंने प्रार्थना करके शकटाल को अन्धकूप से निकलवाया। कारण यह कि ब्राह्मण जाति स्वभावतः शान्त होती है ॥५॥ 'वररुचि के रहते हुए योगनन्द पर विजय नहीं किया जा सकता। अतः इस समय बक के समान मन्द नीति धारण करके कुछ समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए' ॥६॥ ऐसा सोचकर शकटाल मेरी सम्मति से पुनः मन्त्रित्व-पद प्राप्त कर राजकार्य करने लगा ॥७॥ किसी समय योगनन्द नगर से बाहर गया और पाँचों अँगुलियों से मिले हुए हाथ को उसने कड़ाही में घूमते हुए देखा ॥८॥