भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक १५५ उसने उसकी स्त्री से पूछा कि तुम्हारा पति कहाँ है। वह भी उसे उत्तर न देकर पति के पास चली गई ॥१४५॥ पति को मित्र के आने की सूचना देती हुई स्त्री से उसने कहा—'मेरे पास पैरों को पकड़ कर रोती हुई बैठी रहो' और मेरे मित्र से कहना कि मेरा पति मर गया है। उसके चले जाने पर हम दोनों सुख से खीर खायेंगे' ॥१४६-१४७॥ पति की यह आज्ञा पाकर वह बैठकर रोने लगी। तब उस मित्र मेहमान ने स्त्री से पूछा कि 'यह क्या हुआ ?' ॥१४८॥ 'देखो मेरा पति मर गया' उसने इस प्रकार कहा। उसके ऐसा कहने पर उस धूर्त मित्र ने सोचा—'कहाँ तो मैंने इसे आनन्द से खीर पकाती हुई देखा था और कहाँ अभी-अभी इसका पति बिना किसी रोग के मर गया। अवश्य ही इन दोनों ने मुझे देखकर यह ढोंग रचा है ॥१४९-१५०॥ इसलिए मुझे अब यहाँ से न जाना चाहिए—ऐसा सोचकर वह भी वहीं जमकर बैठ गया। और 'हाय मित्र हाय मित्र'—इस प्रकार रोने-चिल्लाने लगा ॥१५१॥ उसका चिल्लाना सुनकर उसके पड़ोस के सभी बन्धु और मित्र वहाँ आ गये और उसे मरा हुआ देखकर उस मूर्ख ठस्क को श्मशान ले जाने की तैयारी करने लगे ॥१५२॥ तब उसकी स्त्री ने एकान्त में उसके कान में कहा—'उठो। नहीं तो ये सारे भाई- बन्धु तुम्हें श्मशान में ले जाकर फूंक डालेंगे' ॥१५३॥ उसने कहा—'ऐसा न होगा। यह धूर्त ठस्क मेरी खीर खाना चाहता है। अतः, मैं जब मर गया हूँ तब इसके यहाँ से गये बिना न उठूँगा ॥१५४॥ मेरे जैसे लोगों के लिए एक मुट्ठी अन्न भी प्राणों से अधिक है। उस मूर्ख ने एकान्त में ही इस प्रकार अपनी पत्नी से कहा ॥१५५॥ तब उस दुष्ट मित्र ने बन्धु बान्धवों के साथ उसे ले जाकर चिता में फूंक दिया किन्तु वह जलते समय भी तनिक भी हिला-डुला नहीं और न मुख से ही कुछ बोला ॥१५६॥ इस प्रकार उस मूर्ख ने खीर के पीछे अपने प्राण दे दिये और इतने कष्टों से कमाया हुआ उसका धन दूसरों ने भोगा ॥१५७॥ मार्जार-मूर्ख की कथा कंजूस की कथा सुनी अब मार्जार-मूर्ख की कथा सुनो—'उज्जयिनी के किसी मठ में एक वृद्ध अध्यापक रहता था ॥१५८॥ चूहों के उपद्रव के कारण रात को उसे नींद नहीं आती थी इस कारण दुःखी होकर उसने अपने किसी मित्र से अपना यह कष्ट सुनाया ॥१५९ ॥