कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक ९५७ 'यहाँ एक बिल्ली लाकर रखो वह चूहा को खा जाती है'—ऐसा उत्तर अध्यापक के मित्र ने दिया ॥१६०॥ 'बिल्ली कैसी होती है और कहाँ रहती है, उसे मैंने पहले कभी नहीं देखा' अध्यापक के इस प्रकार कहने पर उसके मित्र ने फिर कहा—॥१६१॥ 'उसकी आँखें चमकीली होती हैं उसका रंग काला और भूरा होता है और पीठ पर रोएँदार चमड़ी होती है। वह यहाँ गलियों में घूमती-फिरती रहती है ॥१६२॥ मित्र इन चिह्नों से उसे ढूँढ़कर शीघ्र ही मँगवाओ। ऐसा अध्यापक के मित्र ने उससे कहा और कहकर वह अपने घर चला गया ॥१६३॥ तब उस मूर्ख अध्यापक ने अपने शिष्यों से कहा—यहाँ बैठे हुए 'तुमलोगों ने बिल्ली के चिह्न तो सुन ही लिये हैं, अतः गलियों में जाकर इन चिह्नों के अनुसार बिल्ली को ढूँढ़ लाओ' गुरु की आज्ञा से बिल्ली की खोज में गये हुए वे शिष्य गलियों में इधर-उधर घूमने लगे। फिर भी उन्होंने उन लक्षणोंवाली बिल्ली कहीं नहीं देखी। कुछ समय के पश्चात् उन्होंने गली के मुहाने से निकलते हुए एक ब्रह्मचारी बटु को देखा। उसके दोनों नेत्र चमकीले थे रंग काला और भूरा था और उसने अपनी पीठ पर रोएँदार मृगचर्म ओढ़ रखा था ॥१६४—१६७॥ उसे देखकर उन लोगों ने कहा—'यही वह बिल्ली है, जिसे हमने सुना था। अतः उसे रोककर वे अपने गुरु के समीप ले गये ॥१६८॥ गुरु ने भी मित्र से बताये हुए उन लक्षणों से युक्त उस बटु को देखकर और उसे बिल्ली समझकर अपने मठ में रख लिया ॥१६९॥ उन्हें 'बिल्ली बिल्ली' कहते सुनकर उस मूर्ख बटु ने भी अपने को बिल्ली ही समझ लिया। क्योंकि वह मूर्खो से अपना यही नाम सुनता था ॥१७०॥ वह बटु (बालक) भी उस अध्यापक के उसी मित्र का पुत्र था जिसने उसे बिल्ली की पहचान बताई थी ॥१७१॥ प्रातःकाल ही उस मठ में आये उस ब्राह्मण ने वहाँ पर उस बटु (ब्रह्मचारी बालक) को देखा और 'इसे यहाँ कौन लाया ? इस प्रकार उसने उन मूर्खो से पूछा ॥१७२॥ तब गुरु के शिष्य बोले—'हमलोगों ने तुमसे ही बिल्ली का लक्षण सुनकर इसे पकड़ कर यहाँ ला रखा है' ॥१७३॥