कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextदशम लम्बक ९५९ यह सुनकर वह ब्राह्मण हँसकर बोला—अरे मूर्खो कहाँ यह मनुष्य और कहाँ वह पशु ? बिल्ली के चार पैर होते हैं और उसकी पूँछ भी होती है। यह सुनकर वे मूर्ख शिष्य उस बालक को छोड़कर बोले—'तब वैसे ही ढूँढ़कर लाते हैं' ॥१७५॥ ऐसा कहते हुए उन्होंने सभी को हँसा दिया। सच है, मूर्खता किसके हास्य का कारण नहीं होती ॥१७६॥ मार्जार-मूर्ख की कथा सुनी अब कुछ और मूर्खों की कथाएँ सुनो। किसी एक मठ में मूर्खो का मुखिया एक महामूर्ख था ॥१७७॥ उसने किसी कथावाचक से सुन लिया कि 'तालाब बनवानेवाले को इस लोक में बहुत पुण्य मिलता है। वह मठाधीश धनी था। उसने अपने मठ के पास ही पानी से भरा एक विशाल तालाब बनवाया ॥१७८ १७९॥ एक बार वह मूर्खराज उस तालाब को देखने के लिए गया । उसने तालाब के किनारों को किसी के द्वारा उखाड़े हुए देखा ॥१८०॥ इसी प्रकार दूसरे दिन उसने दूसरी ओर देखा और वह सोचने लगा कि 'यह कौन इसके किनारों को तोड़ता है। कल प्रातःकाल ही आकर यहाँ सारा दिन रहकर देखूँगा कि कौन ऐसा करता है—ऐसा सोचकर वह दूसरे दिन प्रातःकाल ही ज्यों ही वहाँ आया उसने आकाश से उतरकर सींग से किनारों को तोड़ते हुए एक बैल को देखा। 'ओह ! यह तो दिव्य बैल है इसलिए मैं भी इसके साथ ही सीधे स्वर्ग क्यों न चला जाऊँ ? —ऐसा सोचकर और उसके पास जाकर उसने हाथों से उस बैल की पूँछ पकड़ ली ॥१८१—१८४॥ पूँछ पकड़े हुए उसे लेकर नन्दी भगवान् क्षण-भर में अपने कैलासधाम जा पहुँचे ॥१८५॥ वह मूर्ख मठाधीश दिव्य भोजन लड्डू आदि खाकर, कुछ दिनों तक वहीं सुखपूर्वक रहा । नन्दी को प्रतिदिन पृथ्वी पर यातायात करते हुए देखकर वह मूर्खराज सोचने लगा कि बैल की पूँछ पकड़कर नीचे जाऊँ और अपने बन्धु-मित्रों से मिलूँ। उन्हें यह आश्चर्यजनक घटना सुनाकर फिर आ जाऊँगा । ऐसा सोचकर एकबार वह मूर्खराज उस नन्दी के पास जाकर उसकी पूँछ पकड़कर भूमि पर आ गया ॥१८६—१८९॥