भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक ९९३

उसने पुत्र के लिए शिवाराधन-तप किया। तब प्रसन्न शिवजी ने उसके आगे प्रकट होकर आदेश दिया कि 'तुझे एक पुत्र उत्पन्न होगा और वह विद्याधर का अवतार होगा। अन्त में शाप का क्षय होने पर वह अपने लोक को चला जायगा ॥१७० -१७१॥ दूसरा पुत्र तेरे वंश और राज्य को चलानेवाला होगा। शम्भू के इस प्रकार वाग्दान से प्रसन्न राजा ने उठकर व्रत की पारणा की ॥१७२॥ समय आने पर उसके यहाँ लक्ष्मीसेन नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ और क्रम से दूसरा पुत्र शूरसेन नाम का हुआ ॥१७३॥ इसलिए, तुम मुझे उस राजा का ज्येष्ठ पुत्र लक्ष्मीसेन समझो। मेरा यह वेगवान् घोड़ा आखेट के लिए निकले मुझे यहाँ ले आया है' ॥१७४॥ उसके द्वारा इस प्रकार कही गई राजपुत्री अपने पूर्वजन्म का स्मरण करके उससे अपना वृत्तान्त कहकर इस प्रकार बोली—॥१७५॥ तुम्हारे कहने पर मैंने भी विद्याओं के साथ अपनी जाति का स्मरण कर लिया। मैं इस सखी के साथ शापच्युता विद्याधरी हूँ ॥१७६॥ तू अपने मन्त्री के साथ शापच्युत विद्याधर मेरा पति है। और, तेरा वह मन्त्री इस मेरी सखी का पति है ॥१७७॥ सखी के साथ मेरा वह शाप अब क्षीण हो गया है। अब हम सब का विद्याधर-लोक में फिर समागम होगा' ॥१७८॥ इस प्रकार कहकर और अपने दिव्य विद्याधर-रूप को प्राप्त कर, हेमप्रभा अपनी सखी के साथ आकाश में उड़कर, अपने लोक को चली गई ॥१७९॥ लक्ष्मीसेन वहाँ बैठकर जब इन सब घटनाओं को आश्चर्य के साथ देख रहा था कि तभी उसे ढूँढ़ता हुआ उसका मन्त्री उसी मार्ग से वहाँ आ गया ॥१८० ॥ राजपुत्र लक्ष्मीसेन जब अपने मित्र मन्त्री को वहाँ का समाचार सुना ही रहा था इतने में ही अपनी कन्या को देखने के लिए उत्सुक राजा बुद्धिप्रभ भी वहाँ आ गया ॥१८१॥ उसने भी अपनी कन्या हेमप्रभा को वहाँ न देखकर लक्ष्मीसेन से उसका समाचार पूछा। लक्ष्मीसेन ने जो कुछ देखा सुना था वह सब उससे कह सुनाया ॥१८२॥ तब बुद्धिप्रभ के व्याकुल होने पर, और लक्ष्मीसेन अपने मन्त्री के साथ शाप-मुक्त होने तथा पूर्वजाति का स्मरण करने पर, आकाश में अपने विद्याधर-लोक को गया ॥१८३॥ और, वहाँ जाकर पूर्वजन्म की पत्नी हेमप्रभा को पाकर उसे अपने पिता बुद्धिप्रभ से मिलाया उसके बाद बुद्धिप्रभ अपने नगर को लौट गया ॥१८४॥ १२५