कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकादश लम्बक १९ मैं भद्रभाता को ऐसा सन्देश भेज दूँगा कि वह उसे तुम्हे ही देगा। इस प्रकार कहकर और मेरा समुचित सम्मान करके शिरार ने मुझे घर भेज दिया ॥५२॥ दूसरे दिन शिरार ने अपने पुरोधा और माल-सामान के साथ उस कन्या को समूचे मार्ग से नाव पर बैठाकर, सिंहल द्वीप भेज दिया ॥५३॥ उसके जाने के उपरान्त जब मैं सिंहल द्वीप जाने को उद्यत हुआ तब वायुयान के समान यह समाचार वहाँ फैल गया ॥५४॥ कि शिरार की कन्या जिस नाव से गई थी वह नाव समुद्र में डूब गई। एक भी व्यक्ति उनमें से समुद्र से नहीं निकल सका ॥५५॥ उस समय समाचार-रूपी ओलों से जर्जर और नाव के लिए व्याकुल असहाय होकर में शोक-समुद्र में डूब गया ॥५६॥ बड़ा स धैर्य विश्वाय जाते हुए और आशाओं से मन को शान्त करते हुए मैंने यह समाचार जानने के लिए सिंहल द्वीप जाने का निश्चय किया ॥५७॥ तदनन्तर राजा का प्रिय होने पर और तरह-तरह के धन से समृद्ध होने पर भी मैंने जहाज पर चढ़कर समुद्र-यात्रा की ॥५८॥ जब मैं समुद्र-यात्रा कर ही रहा था कि इतने में धारा-रूपी बाणों का वर्षा करता हुआ भीषण वाष्प-रूपी चोर, अकस्मात् आकाश में चढ़ आया ॥५९॥ तब विपरीत वायु से और थपेड़े बलवान् भाग्य से बार-बार टकराकर उछलता हुआ जहाज टूट-फूट कर डूब गया ॥६०॥ भाग्यवश मेरे साथियों और धन-सम्पत्ति के समुद्र में डूब जाने पर समुद्र ने बड़े दया मैंने एक बड़ा लकड़ी का तख्ता पा लिया ॥६१॥ उस पर पड़कर और हावा से उस धारा-बहाव में वायु के अनुकूल होने पर किसी प्रकार किनारे पर पहुँच गया ॥६२॥ तट पर लग कर जीवित रहने का निश्चय करने पर मैंने वहीं पर गिरा हुआ माल का एक टुकड़ा पाया ॥६३॥ उस फटे-तख्तों के मध्य बचकर आये हुए अधिक कष्ट से अत्यन्त दुर्बल और दोनों के न रहने पर मैंने समुद्र-कण्ठ को बचाने की बुद्धि का विचार किया ॥६४॥ इसके दिन मैंने देखा कि उस द्वीप के किनारे बहुत-सी ह्वेल मछलियाँ तैरती हुई किनारे पर आनी शुरू हुईं ॥६५॥ उन लोगों ने अपने पंखों से पानी को उछालते हुए किनारे पर पहुँचकर और किनारे की गुफा में मुँह फैलाकर उस मांस के टुकड़े को खाने के लिए दौड़ीं ॥६६॥