कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक ९७ यह कहकर अपनी प्रतिज्ञा सुनाकर फिर बोला—'प्रिये ! यह राजा अत्यन्त बलवान् है अत' अजेय है। यह मेरे साथ द्वन्द्व-युद्ध कर सकता था क्योंकि मैं आकाशचारी होकर भूमि चारी को मारना नहीं चाहता था। कौन व्यक्ति क्षत्रिय होकर अधर्म-युद्ध से विजय प्राप्त करना चाहेगा ? ॥१३२—१३३॥ इसलिए, मेरी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए द्वार पर आये हुए नरसिंह के आगमन की सूचना दिलाने में मेरी सहायता करो ॥१३४॥ यह सुनकर वेश्या बोली—'मैं धन्य हूँ'। तदनन्तर राजा से आवश्यक परामर्श करके वेश्या ने अपने बन्दियों को बुलाकर कहा—'राजा नरसिंह जब मेरे घर पर आवेगा तब तुम लोग उसपर दृष्टि रखते हुए द्वार के पास ही रहना और उसके द्वार में प्रवेश करने के समय कहना— 'महाराज ! राजा नरसिंह आप पर भक्ति और अनुराग रखता है। यदि राजा नरसिंह उस समय यह कहे कि यहाँ कौन ठहरा है तो कहना कि यहाँ राजा विक्रमादित्य है। ऐसा कहकर और उन्हें विदाकर मदनमाला ने द्वारपालिका से कहा—'यहाँ अन्दर आते हुए राजा नरसिंह को रोकना नहीं' ॥१३५–१३९॥ ऐसा प्रबन्ध करके प्राणनाथ को पुनः प्राप्त की हुई मदनमाला भिक्षुओं को असंख्य धन देती हुई राजा के साथ सुख से रहने लगी ॥१४० ॥ तदनन्तर, सोने के पुष्पों द्वारा असंख्य दान करती हुई मदनमाला का समाचार सुनकर चकित राजा नरसिंह उस वेश्या के घर का परित्याग कर बने पर भी सोने के पुष्पों को देखने के लिए उसके यहाँ आया ॥१४१॥ द्वारपालों से न रोके हुए राजा नरसिंह के भीतर आते ही मदनमाला के बन्दीजन बाहरी द्वार से ही जोर से चिल्लाकर बोले—'महाराज राजा नरसिंह आपके प्रति भक्ति रखता है। और भक्त है। यह सुनकर राजा नरसिंह क्षण भर के लिए क्रोध और शंका से भर गया ॥१४२–१४३॥ उसने पूछा कि यहाँ कौन ठहरा है ? राजा विक्रमादित्य को यहाँ ठहरा हुआ जानकर राजा नरसिंह ने एक क्षण के लिए सोचा—॥१४४॥ राजा विक्रम ने पहले ही द्वार पर मेरी सूचना दिलाने की प्रतिज्ञा की थी उस प्रतिज्ञा को राजा ने हठात् मेरे घर में घुसकर ही पूरा किया ॥१४५॥ आश्चर्य है कि यह राजा बहुत तेजस्वी है जिसने आज ही मुझे जीत लिया और एकाकी एवं मेरे घर पर आया हुआ यह मेरे लिए मारण योग्य भी नहीं है ॥१४६॥ १३