कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक १३५ किन्तु, मरुभूति मन्त्री मद्यके-मद में कुछ अलसाता हुआ फूलों का गजरा डाले और इत्र आदि लगाये हुए लड़खड़ाती हुई गति और जबान से अन्य मित्रों को हँसाता हुआ कुछ देर से आया उसकी इस दशा से मुस्कराते हुए गोमुख ने मजाक करते हुए कहा- ॥१३॥ 'तुम यौगन्धरायण के पुत्र होकर भी नीति नही जानते। प्रातःकाल शराब पीते हो और नशे की बेहोशी में राजा के पास आते हो ? ॥१४॥ यह सुनकर क्रोध से बेहोश मरुभूति गोमुख से बोला- यह बात तो या मेरे स्वामी (राजा) या मेरे पिता कह सकते हैं ॥१५॥ अरे द्वारपक (द्वारपाल) के बच्चे ! बोलते तो सही। तुम मुझे शिक्षा देते हो? ऐसा कहते हुए मरुभूति से गोमुखने फिर कहा- क्या प्रभुजन अविनीत (उद्दण्ड) को अपनी बातों से फटकारते हैं। ऐसी बातें तो राजा के पार्श्ववर्ती व्यक्ति ही कह रहे हैं। यह सच है कि मैं द्वारपक (द्वारपाल) का पुत्र हूँ और तुम मन्त्रिवृषभ (बैल और श्रेष्ठ) हो। तुम्हारी यह स्थिति ही तुम्हारी मूर्खता (बैलपन) बता रही है। केवल दो सींग ही तो नहीं हैं। ॥१६-८॥ गोमुख से ऐसा कहा गया मरुभूति बोला--'बैलपन तो तुम्हें ही अधिक सजता है तुम्हारा नाम ही गौ-मुख है। फिर भी जो तुम्हारी उद्दण्डता है, उसका कारण तुम्हारी वर्णसंकरता ही है' यह सुनकर सब लोगों के हँस देने पर गोमुख फिर बोला-॥१९-१॥ यह मरुभूति वह रत्न है जिसमें सैकड़ों यत्न करने पर भी इस अभेद्य रत्न में बाण (गुण) का प्रवेश कौन करा सकता है॥ ११॥ दूसरा कोई पुरुष रत्न हो तो उसका बेधन बिना प्रयत्न के ही हो जाता है। इस प्रसंग में चिरन्ता-शत्रु का उदाहरण सुनाता हूँ।-॥१२॥ चिरन्ता-शत्रु की कथा प्रतिष्ठान नामक नगर में तारादत्त नाम का कोई ब्राह्मण था वह पिता के अनेक कष्ट देने पर भी बाल्यावस्था में अध्ययन नहीं कर सका ॥१३॥ पिता के मरने पर सभी लोगों से तिरस्कृत किया जाता हुआ वह अत्यन्त विरक्त होकर विद्या की सिद्धि के लिए श्मशान पर जप करने गया ॥१४॥ वहाँ पर अत्यन्त उग्र तपस्या में लगे हुए उस देखकर आश्चर्य चकित दूसरे ब्राह्मण ने वट- बेल से वहाँ गया ॥१५॥ वहाँ पर बैठकर दूर संन्यासीने गंगा के जल से बाल गुण लगाकर पैंजन लगा और वह ब्राह्मण उसे देखता रहा ॥१६॥