कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextसप्तम लम्बक १७१ तब अप्रतिहत शक्तिवाले दोनों वीर अनेक राजाओं को मिलाकर अपने प्रताप और अधिकार जमाकर दक्षिण दिशा को गये ॥८६॥ उनका विजय-समाचार सुनकर उनके माता-पिता अत्यन्त प्रसन्न हुए किन्तु दूसरी माता काव्यालङ्कारा द्वेषाग्नि की ज्वाला से भीतर-ही-भीतर जल-भुन गई ॥८७॥ 'इन मेरे दोनों लड़कों ने पृथ्वी को जीतकर और मुझे मारकर मेरे राज्य पर अधिकार कर लेने का निश्चय किया है। इसलिए, यदि तुम लोग मेरे सच्चे स्नेही और भक्त हो तो बिना विचारे इन दोनों को मार डालो। -इस प्रकार, सेना-अधिकारियों के नाम राजा का आज्ञापत्र कायस्थ (मुंशी) से (घूस देकर) लिखवा लिया और धन देकर सन्देश ले जानेवाले दूत के हाथ काव्यालंकारा ने गुप्त रूप से सेना के शिविर में भेज दिया। दूत ने शिविर में जाकर पत्र दे दिया ॥८८-९२॥ सेनाधिकारियों ने पत्र लेकर और उसे बाँचकर राजनीति को अत्यन्त कठोर जानकर और राजा की आज्ञा को अनुलंघनीय समझकर दोनों राजकुमारों को मार डालने के लिए रात्रि के समय सम्मति की और विवश होकर मारने का निश्चय किया ॥९३-९४॥ उन अधिकारियों में एक ने जो उन बालकों के नाना बूढ़े प्रधान मन्त्री का मित्र था इस बात की सूचना उसे दी। सूचना पाकर बूढ़े प्रधान मन्त्री उन दोनों नातियों को सावधान करके और अच्छे घोड़ों पर बैठकर उनके साथ रात में ही सेना-शिविर से भाग गया। जंगली मार्ग न जानने के कारण भटकते हुए दोनों राजकुमार और उनका बूढ़ा नाना मध्याह्न की धूप में विन्ध्य पर्वत के जंगल में भूख-प्यास से व्याकुल हो गये। उनके दोनों घोड़े प्यास से मर गये और भूख-प्यास के क्लेश से बूढ़ा उनका नाना मन्त्री भी उनके देखते-देखते ही मर गया ॥९५-९९॥ 'पिता ने दुष्टा दूसरी माता को प्रसन्न करने के लिए निरपराध हम लोगों को वैसी दशा में पहुँचा दिया'—॥१ ॥