कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउसके वैभव को देखकर उसके कुटुम्बियों ने पता लगा लिया कि इसे कहीं खजाना हाथ लगा है। अतः, ईर्ष्यावश उन्होंने राजा से जाकर सारा समाचार सुना दिया ॥४४ ॥ राजा ने पहरेदार को भेजकर सत्वशील को बुलवाया। वह भी राजभवन के आँगन में आकर एक कोने में खड़ा हो गया। वहाँ पर एकान्त में उसने हाथ में ली हुई छड़ी की नोक से मिट्टी की कच्ची भूमि खड़े-खड़े खोद डाली और उसे वहाँ पर ताँब के घड़े में भरी हुई मुहरों का खजाना दीख पड़ा ॥४१-४२॥ यह खजाना क्या मिला मानों देव ने—'इसे देकर राजा को संतुष्ट करो' इस प्रकार का प्रकाश दिया ॥४३॥ सत्वशील ने उस गढ़े को मिट्टी से भर दिया और द्वारपाल के साथ राजा के सम्मुख उप- स्थित हुआ। उसके प्रणाम करने पर राजा ने स्वयं कहा—॥४४॥ 'मुझे मालूम हुआ है कि तुम्हें खजाना मिला है। उसे हमें सौंप दो' ॥४५॥ यह सुनकर सत्वशील नम्रभाव से बोला कि 'महाराज ? पहले मिला हुआ खजाना समर्पण करूँ या आज का मिला हुआ ? ॥४६॥ राजा ने कहा—अभी प्राप्त धन-भाण्डार मुझे दो। सत्वशील ने राजा को एकान्त में ले जाकर तुरन्त देखा हुआ धन-भाण्डार दे दिया ॥४७॥ राजा ने प्रसन्न होकर कहा—'पहले भाण्डार को तुम आनन्द से भोगो'। इस प्रकार सन्तुष्ट राजा से आज्ञा पाकर सत्वशील अपने घर आया ॥४८॥ घर जाकर अपुत्रता के दुःख को किसी प्रकार भुलाता हुआ सत्वशील दान और भोग से भाण्डार को घटाता हुआ अपने नाम को चरितार्थ करने लगा ॥४९॥ विद्याधर राजा हेमप्रभ ने कहा कि 'इस प्रकार सत्वशील की कथा स्मरण करके पुत्र न होने की चिन्ता से दुःखी हूँ' ॥५० ॥ पति हेमप्रभ से इस प्रकार कही गई रानी अलंकारप्रभा उससे बोली—॥५१॥ 'यह सच है कि उदार हृदयवालों की दैव भी सहायता करता है। क्या दूसरा स्वर्ण भाण्डार देकर दैव ने सत्वशील की संकट के समय सहायता नहीं की ? ॥५२॥ इसी प्रकार, तुम भी अपने सत्त्व के प्रभाव से इच्छित फल प्राप्त करोगे। इस सम्बन्ध में उदाहरणस्वरूप विक्रमत्तुंग नामक राजा की कथा सुनो'— ॥५३॥
विक्रमत्तुंग राजा की कथा पृथ्वी का अलंकारस्वरूप पाटलिपुत्र नाम का नगर है जिसमें पूर्व वाणिशाली नाना प्रकार की मणियों जड़ी हुई हैं ॥५४॥ २