कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextसप्तम लम्बक १८५ एक बार पिता परित्यागसेन को निवेदन करके इन्दीवरसेन अपने छोटे भाई के साथ पुनः दिग्विजय के लिए चला ॥१९१॥ उस महाबली इन्दीवरसेन ने देवी के खड्ग के प्रभाव से सारी पृथ्वी का विजय करके और भाई के साथ पुनः राजधानी में आकर अपने पिता और माता अधिकप्रभा को आनन्दित किया ॥१९२-१९३॥ राजधानी में आकर अनुजीवी राजाओं का सम्मान-सत्कार आदि करके अपनी पत्नियों के साथ उसने वह दिन आनन्द से व्यतीत किया ॥१९४॥ एक दिन उस राजपुत्र ने कर के द्वारा सारी पृथ्वी का राज्य पिता को सौंपकर अकस्मात् अपने पूर्व जन्म का स्मरण किया ॥१९५-१९६॥ तब सन्ध्या जाकर उत्त हुआ वह राजकुमार इन्दीवरसेन अपने पिता से बोला— हे पिता ! मैंने अपने पूर्वजन्म का स्मरण कर लिया है। कहता हूँ सुनो—॥१९७॥ हिमालय के शिखर पर मुक्ता पुर नाम का एक नगर है। वहाँ पर मरुद्गत नाम का विद्याधरों का राजा है। कनकवती नाम की उसकी रानी से पद्मसेन और रूपसेन नाम के दो गुणवान् पुत्र हुए। उन दोनों में से पद्मसेन नामक बड़े कुमार को आदित्यप्रभा नाम की विद्याधर-कन्या ने स्वयं वरण कर लिया ॥१९८-२००॥ यह देखकर आदित्यप्रभा की छोटी कनकप्रभा नाम की विद्याधर-कन्या ने भी प्रसन्न होकर रूपसेन को वर लिया ॥२०१॥ इस प्रकार दो पत्नियोंवाला पद्मसेन गौड़ के द्वार कनकवती उस आदित्यप्रभा के साथ रमण करने लगा ॥२०२॥ उस पत्नी के कलह से दुःखी होकर पद्मसेन ने पिता मरुद्गत से आग्रहपूर्वक कहा कि पिताजी ! मैं इस कन्या को पत्नीत्व के लिए स्वीकार ले जाता हूँ। इस बीचका बात का रहस्य नहीं खुला। उस समय विद्याधर कन्या ने ॥२०३-२०४॥ यह सुनकर बड़े भाई पद्मसेन ने पिता से आग्रहपूर्वक पूछा और छोटे भाई के लिए विदा होकर उस कन्या का स्वयं वरण करके भाई को दे दूँगा ॥२०५॥