कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक १८७ यहाँ मर्त्यलोक में भी यह कलहकारिणी तुम्हारी भार्या आदित्यप्रभा राक्षस-योनि में उत्पन्न होकर तुम्हारी ही पत्नी होगी। यह दूसरी तुम्हारी प्यारी चन्द्रावती भी राक्षसी और राजा की रानी होकर तुम्हें ही पति के रूप में प्राप्त करेगी ॥२६२-७॥ तुम्हारा साथ देने की इच्छा करनेवाला यह तुम्हारा भाई रूपशग भी मर्त्यलोक में तुम्हारा भाई ही बनेगा ॥२८॥ मर्त्यलोक में भी दो पत्नियों के होने का दुःख कष्ट भी प्राप्त कराग ! ऐसा कहकर और कुछ क्षण रुककर हमारे पिता ने शाप का अन्त इस प्रकार किया—॥२९॥ 'तुम राजपुत्र होकर, पृथ्वी को जीतकर जब पिता को पृथ्वी प्रदान करोगे तब इन सब (पत्नियों और भाई) के साथ पूर्वजन्म का स्मरण करके शाप से छूट जाओगे' ॥२१०॥ अपने पिता से इस प्रकार कहा गया पद्मसेन उन पत्नियो और भाई के साथ उसी समय पृथ्वी पर अवतीर्ण हुआ ॥२११॥ अतः हे पिता ! वह पद्मसेन मैं इन्दीवरसेन नाम से तुम्हारा पुत्र हुआ और जो करना था किया। यह दूसरा विद्याधर-कुमार रूपशेग है जो यह अनिष्ठासेन के नाम से तुम्हारा दूसरा पुत्र हुआ जो मेरा पूर्वजन्म का छोटा भाई ही है। आदित्यप्रभा और चन्द्रावती नामवाली ये दोना मेरी पत्नियां ही यमदंष्ट्रा और मदनदंष्ट्रा हैं। अब हम सब लोगों के शाप की अवधि समाप्त हो गई है। अब हम अपने विद्याधर-नगर को जाते हैं॥२१२-२१५॥ ऐसा कहकर वह इन्दीवरसेन अपने पूर्वजन्म का स्मरण करती हुई पत्नियों और छोटे भाई के साथ मानव-शरीर को छोड़कर और विद्याधर-शरीर धारण कर, माता-पिता के चरणों में प्रणाम करके और दोनों पत्नियों को गोद में उठाकर छोटे भाई के साथ अपने विद्याधर स्थान को चला गया ॥२१६-२१७॥ वहाँ विद्याधर-नगर में पिता मुक्तसेन से अभिनन्दन किया गया माता की आँखों का तारा रूपसेन से युक्त वह पद्मसेन ईर्ष्या रहित आदित्यप्रभा और चन्द्रावती के साथ सुख से रहने लगा ॥२१८-२१९॥