कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक १९१ गोमुख से इस प्रकार प्रोत्साहित नरवाहनदत्त गोमुख के साथ जल्दी-जल्दी रास्ता चलने लगा ॥७॥ और, चलते-चलते क्रमश समुद्र तट पर स्थित पर्वताकार अट्टालिकाओं गलियों एवं नगर-द्वारों तथा सुमेरु के समान सात के राजभवनों से युक्त विशाल विस्तारवाले भू-मण्डल के समान नगर में पहुँचा ॥८ ९॥ उस नगर में बाजार के रास्ते से मुड़कर जाते हुए उसने सब कुछ लकड़ी का बना हुआ और सजीव प्राणी के समान चेष्टा करता हुआ देखा ॥१०॥ बनिया वेश्याएँ, नागरिक आदि सभी आश्चर्यकारक थे। वे करते सब कुछ थे किन्तु बोल न सकने के कारण निर्जीव मालूम पड़ते थे ॥११॥ नरवाहनदत्त गोमुख के साथ हाथी घोड़े आदि देखता हुआ क्रमशः उस नगर के राजभवन के समीप जा पहुँचा ॥१२॥ और, उस सुवर्णमय नगर के मस्तक के समान शोभित उस राजभवन में अत्यधिक आश्चर्य के साथ अन्दर गया ॥१३॥ जिसमें यन्त्र के बने हुए पहरेदार, वेश्याएँ आदि यथावश्यक भरे हुए थे और उनके मध्य इन्द्रियों का संचालन करनेवाले आत्मा के समान उन सभी जड़ पदार्थों का संचालन करनेवाले सबके अधिष्ठाता के रूप में रत्न-सिंहासन पर बैठे हुए भव्य पुरुष को देखा ॥१४ १५॥ उस पुरुष ने भी अच्छी आकृति देखकर नरवाहन दत्त उच्चकोटि का पुरुष समझा और स्वागत करके आसन पर बिठाया ॥१६॥ और सामने बैठकर पूछा कि 'तुम कौन हो और एक व्यक्ति के साथ मनुष्यों से अगम्य इस भूमि में कैसे पहुँचे ? ॥१७॥ तब नरवाहनदत्त ने भी अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त कहकर उस पुरुष से नम्रतापूर्वक पूछा—॥१८॥ तुम कौन हो ? और यह आश्चर्यमय तुम्हारा नगर कैसा है ? यह सुनकर उस व्यक्ति ने अपना वृत्तान्त कहना प्रारम्भ किया ॥१ ॥ राज्यधर बढ़ई की कथा बड़े अच्छे गुणों से चुनी गई और वसुधा-वधू की काची (करधनी) के समान अलंकार-रूप काची नाम की एक नगरी है ॥२ ॥