भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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मध्यम लम्बक २३९ सेना के साथ आये हुए उसके मामा को भी बाँधकर उसका सिर मुँड़वा दिया। दर्पभंग और विच्छिन्ननाम के साठों का उसने क्रुद्ध होकर भी वध नहीं किया प्रत्युत हँसकर उन्हें छोड़ दिया ॥५९१॥ तदनन्तर पिता के बुलाने पर वह सूर्यप्रभ अपनी उन सब पत्नियों के साथ अपने घर शाकलपुर (स्यालकोट) चला गया ॥५९२॥ तब उसके पिता चन्द्रप्रभ के समीप ताम्रलिप्ती से राजा वीरभट ने दूत भेजा और सन्देश दिया कि तुम्हारे पुत्र ने मेरी दो कन्याओं का अपहरण किया है, वह विद्याओं की सिद्धिवाला योग्य पति है इसलिए ठीक है॥५९३॥ यदि आपको हम पर स्नेह है, तो आप यहाँ आयें जिससे विवाह-संस्कार द्वारा हम मित्रता स्थापित कर सकें ॥५९४॥ दूत का यह वाक्य सुनकर राजा चन्द्रप्रभ ने उसका सत्कार करके दूसरे ही दिन ताम्रलिप्ती जाने का निश्चय किया ॥५९५॥ राजा चन्द्रप्रभ ने राजा वीरभट की सच्चाई परखने के लिए दूत का आना-जाना दूर होने से कठिन समझकर प्रहस्त को पहले वहाँ भेज दिया ॥५९६॥ प्रहस्त शीघ्र ही जाकर वीरभट से मिला और वीरभट द्वारा उसका श्रद्धापूर्वक स्वागत सत्कार किया गया ॥५९७॥ प्रहस्त ने आश्चर्य चकित वीरभट को प्रातःकाल ही स्वामी के आने की सूचना दी और घड़ी-भर में ही आकाश-मार्ग से वह चन्द्रप्रभ के समीप लौट आया ॥५९८॥ और कहा कि राजा वीरभट कन्यादान के लिए तैयार बैठे हैं। चन्द्रप्रभ ने भी प्रसन्न होकर मन्त्री प्रहस्त का समुचित स्वागत-सम्मान किया ॥५९९॥ तदनन्तर प्रातःकाल ही राजा चन्द्रप्रभ महारानी कीर्तिमती के साथ था तथा सूर्यप्रभ विलासिनी और मदनसेना के साथ अपने रोषम आदि को संग लेकर भूवामन नामक विमान में बैठकर मन्त्रियों-सहित बरात लेकर चल दिये ॥७०१॥ प्रातःकाल दिन के पहले प्रहर में ये लोग ताम्रलिप्ती नगरी जा पहुँचे जब कि नागरिक जन कौतुक के साथ आँख ऊपर करके उन्हें देख रहे थे ॥७०२॥ आकाश-मार्ग से उतरे हुए उन लोगों की वीरभट द्वारा अगवानी किये जाने पर उसी के साथ वे लोग नगरी म प्रविष्ट हुए ॥७०३॥