भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बकं २४५ अतः, तुम्हारी कन्या उचित स्थान पर पहुँच गई है। तुम कठोर प्रकृति के व्यक्ति हो अतः तुमसे कन्या की याचना नहीं की गई। अब तुम प्रसन्न हो जाओ तुम हमारे मित्र हो हम लोग भी आ रहे हैं ॥८८-८९॥ चन्द्रप्रभ का यह सन्देश लेकर प्रहस्त आकाश-मार्ग से एक ही प्रहर में मयराष्ट्र जा पहुँचा। वहाँ राजा रम्भ को सन्देश देकर और उसकी स्वीकृति के साथ लौटकर उसका सन्देश राजा चन्द्रप्रभ को सुनाया ॥९०-९१॥ चन्द्रप्रभ ने दूसरे मन्त्री प्रभास को भेजकर शशाङ्क नगर से रम्भ की पुत्री तारावली को रम्भ के पास पहुँचा दिया ॥९२॥ तदनन्तर, राजा चन्द्रप्रभ सभी बरातियों ताम्रलिप्ती के राजा वीरभट तथा साथ आये हुए अन्य सभी व्यक्तियों के साथ चला और सबके साथ मयराष्ट्र डेरा में जा पहुँचा। तदनन्तर, वहाँ राजा रम्भ द्वारा उनकी अगवानी किये जाने के पश्चात् उसकी राजधानी में गया ॥९३-९४॥ वहाँ विवाह की तैयारी किये हुए राजा रम्भ ने उत्सव किया और सोना रत्न वस्त्र आभूषण आदि कन्या के साथ दिये और जामाता सूर्यप्रभ का भी विशेष रूप से सेवा-सत्कार किया जिससे वह अपने भोगे हुए उत्तमोत्तम सुखों को भी भूल गया ॥९५-९६॥ विवाहोत्सव का आनन्द लेते हुए जब वे वहाँ निवास कर रहे थे उसी समय कांची नगरी के राजा कुम्भीर का दूत राजा रम्भ के समीप आया ॥९७॥ उस दूत का सन्देश सुनकर राजा रम्भ ने महाराज चन्द्रप्रभ से कहा कि कांची के राजा मेरे बड़े भाई कुम्भीर हैं। उन्होंने मेरे पास अपने विश्वस्त दूत को भेजकर यह सन्देश दिया है कि सूर्यप्रभ ने पहले मेरी कन्या का अपहरण किया तब तुम्हारी कन्या का। मैंने अभी सुना है कि तुमने उसके साथ मित्रता कर ली है। अतः अपने ही समान उसके साथ मेरी भी मित्रता करा दो ॥९८-१००॥ वे लोग मेरे घर पर आवें तो मैं भी अपनी कन्या वरप्रभा को अपने हाथ से उनके लिये अर्पण करूँ उनकी यह प्रार्थना स्वीकार करें। ऐसा कहते हुए राजा रम्भ की बात को चन्द्रप्रभ ने स्वीकार किया और प्रहस्त को शशाङ्क नगर भेजकर वरप्रभा को उनके पिता कुम्भीर के पास कांची पहुँचा दिया ॥१०१-१०३॥