भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बक २८१ और चन्द्रप्रभ के जन्म में प्रभास नामक वसु की कन्या का तुमने परिणय किया है, जिसका नाम वसुमती है ।।१७८।। बेटा इन तीनों को तुम्हें समान दृष्टि से देखना चाहिए। ऐसा कहकर उसने उसकी तीनों प्रधान पत्नियों को उसे सौंप दिया ।।१७९।। तब उस दिन सुनीथ ने बड़ी पत्नी तेजस्वती के साथ रात्रि को अपने शयन-भवन में प्रवेश किया।।१८ ०॥ वहाँ पर सुनीथ को उसका सम्भोग-सुख पहले से अनुभूत होने पर भी सर्वथा नवीन प्रतीत हुआ ।।१८१।। पत्नी-रहित सूर्यप्रभ अपने मित्र मन्त्रियों के साथ दूसरे कमरे में पलंग पर अकेला ही सो गया ।।१८२।। 'जो अपनी प्राणप्यारी पत्नियों को बाहर छोड़कर अकेला ही सो रहा है, ऐसे स्नेहहीन के पास जाकर क्या लाभ'? ऐसा सोचकर ही मानों नींद सूर्यप्रभ के समीप नहीं आई ।।१८३।। राज्य-कार्य की चिन्ता में मग्न प्रहस्त के समीप भी नींद मानो इसी ईर्ष्या के कारण ही नहीं आई। और, सभी सूर्यप्रभ के चारों ओर सुख से सो रहे थे ।।१८४।। कलावती की कथा तबतक सूर्यप्रभ और प्रहस्त ने एक सहेली के साथ कमरे में प्रवेश करती हुई अनुपम सुन्दरी कन्या को देखा ।।१८५।। उसके सौन्दर्य के सामने मेरी सूर्यप्रभा-सृष्टि मलिन न होजाय इसलिए मानों ब्रह्मा ने उस कन्या को बनाकर पाताल में छिपा रखा था ।।१८६।। जब सूर्यप्रभ यह सोच ही रहा था कि यह कौन होगी तबतक उस कन्या ने भवन के भीतर सोए हुए उसके मित्रों को एक-एक करके देखना प्रारम्भ किया ।।१८७।। उन सब में चक्रवर्ती के लक्षण न देखकर और उन सबके बीच में सोए हुए सूर्यप्रभ में उन लक्षणों को पाकर अपनी सहेली से वह कन्या बोली—'सखि यह यह है, यत्न से ठंडे हाथों से इसके पैरों को छुओ और इसे जगाओ' ।।१८८-१८९।। यह सुनकर सहेली ने उसी प्रकार उसे जगाया और जान-बूझकर सोए हुए सूर्यप्रभ ने भी धीरे-धीरे आँखें खोलीं ।।१९ ०।। और, उन दोनों कन्याओं को देखकर कहा—'तुम दोनों कौन हो यहाँ क्योंकर आई हो। यह सुनकर उसकी सखी ने कहा—'महाराज सुनिए। दूसरे पाताल में विजयी राजा अनील है। जो हिरण्याक्ष का पुत्र है और बहुत बलवान् है ।।१९१-१९२।।

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