कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextसप्तम लम्बक १९ वह गर्भबती रानी रनिवास में सिंहासन पर बैठी हुई सचमुच रनिवास के रत्न-सी मालूम होती थी ॥११६॥ गर्भ के कारण होनेवाली इच्छा की पूर्ति के लिए वह अपनी विद्या के प्रभाव से व्योम- यान की कल्पना करके आकाश में विचरण करती थी ॥११७॥ गर्भ का समय (दस महीने) पूरा होने पर रानी ने कन्या को उत्पन्न किया। उस कन्या के वर्णन में इतना कहना ही पर्याप्त है कि उस का जन्म पार्वती की कृपा से हुआ था ॥११८॥ उसके उत्पन्न होने पर शिव की आज्ञा का अनुसरण करनेवाली यह आकाशवाणी हुई कि 'यह नरवाहनदत्त की भावी पत्नी होगी' ॥११९॥ राजा ने पुत्रोत्पत्ति के समान ही उसका जन्म-महोत्सव मनाया और उस कन्या का नाम रत्नप्रभा रखा ॥१२ ०॥ राजा ने उस कन्या को अपनी विद्याओं से शिक्षित कर दिया। वह कन्या घर में बढ़ने लगी और उसका प्रकाश चारों दिशाओं में फैलने लगा ॥१२१॥ तदनन्तर राजा ने उस कुमार को युद्ध-विद्याओं में निपुण देखकर उसका विवाह करके उसे युवराज बना दिया ॥१२२॥ पुत्र पर राज्य-भार देकर राजा हेमप्रभ निश्चिन्त और सुखी था किन्तु कन्या के विवाह की एक चिन्ता उसके हृदय में जगी हुई थी ॥१२३॥ एक बार वह राजा अपने पास बैठी हुई विवाह-योग्य कन्या को देखकर समीप में स्थित रानी अलंकारप्रभा से बोला—॥१२४॥ 'हे महारानी ! तीनों लोकों में कुल के अलंकार-रूप होने पर भी कन्या महान् लोगों के लिए भी अत्यन्त दुःखदायिनी होती है ॥१२५॥ यह रत्नप्रभा शिक्षिता रूपवती और विद्याओं की जानकार होने पर भी वर न मिलने के कारण मुझे दुख दे रही है' ॥१२६॥ रानी ने कहा कि 'देवताओं ने इसके नरवाहनदत्त की महारानी होने की आकाशवाणी की है अतः हमारे उस भावी चक्रवर्ती को इसे क्यों नहीं दे देते ? ॥१२७॥ रानी के इस प्रकार कहे गए राजा हेमप्रभ ने उनसे कहा—'ठीक है। वह कन्या धन्य है जो नरवाहनदत्त को पति-रूप में प्राप्त करे। वह कामदेव का अवतार है किन्तु उसने अभी स्थिरता नहीं प्राप्त की। अतः मैं उसकी विद्या प्राप्ति की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। (विद्या प्राप्त होने पर वह दिव्य विद्याधर हो जायगा) ॥१२८-१२९॥ इस प्रकार पिता के मुख से बाण व मोहन-मन्त्रों के समान उन अक्षरों के कान में जाने पर रत्नप्रभा उस पति द्वारा चित्त हरण कर लेने पर व्याकुल-सी मूर्च्छिता-सी सोई-सी और लिखी हुई-सी हो गई ॥१३ ०-१३१॥