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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक २१ तब वह कुमारी माता-पिता को प्रणाम करके और किसी प्रकार उठकर अपने निवास भवन में चली गई और अत्यन्त चिन्ता से व्याकुल होकर किसी प्रकार बड़ी देर के बाद सो गई ॥१३४॥ तब स्वप्न में उस दयामयी पार्वती ने कहा—'बेटी ! कल शुभ दिन है। अतः तुम स्वयं कौशाम्बी में जाकर अपने पति को देखना। तब तुम्हारा पिता स्वयं वहाँ आकर तुम्हारा विवाह करेगा। पार्वती के उस प्रकार के आदेश को उसने प्रातःकाल उठकर अपनी माता से कह सुनाया ॥१३५॥ माता की आज्ञा पाकर और अपनी विद्या के प्रभाव से सब कुछ जानकर वह उद्यान में स्थित अपने पति को देखने के लिए अपने नगर से चली ॥१३६॥ 'हे आर्यपुत्र ! तुम मुझे वही रत्नप्रभा समझो जो उत्कण्ठित होकर तुम्हारे पास आई है। आगे तुम जैसा समझो' ॥१३७॥ इस प्रकार, उसके अमृत को नीचा दिखानेवाले मधुर वचन को सुनकर और नेत्रों के लिए अमृत के समान उस विद्याधरी के सुन्दर रूप को देखकर नरवाहनदत्त विधाता की निन्दा करने लगा कि उसने सारा शरीर ही नेत्रमय और कर्णमय क्यों नहीं बना दिया कि उसे मैं देखता ही रहता और उसके वचन सुनता ही रहता ॥१३८-१३९॥ और बोला—'मैं धन्य हूँ। आज मेरा जन्म सफल हुआ कि तुमने प्रेम से मेरे पास अभिगमन किया ॥१४०॥ इस प्रकार, उन दोनों के परस्पर नवीन प्रेम के कारण वार्तालाप करते हुए ही अकस्मात् आकाश में विद्याधरों की सेना दीख पड़ी ॥१४१॥ 'यह मेरे पिता आये'—रत्नप्रभा के इस प्रकार कहते ही राजा हेमप्रभ अपने पुत्र के साथ आकाश से तुरन्त उतरा ॥१४२॥ वह राजा हेमप्रभ अपने पुत्र वज्रप्रभ के साथ स्वागत करते हुए नरवाहनदत्त के पास आया ॥१४३॥ जबतक वे परस्पर शिष्टाचार करते हुए मिल रहे थे इतने में ही उनका आगमन जानकर वत्सराज उदयन भी अपने मन्त्री के साथ वहीं आ गया ॥१४४॥ आतिथ्य-सत्कार प्राप्त करने के बाद राजा हेमप्रभ ने उदयन को रत्नप्रभा के पूर्व वृत्तान्तानुसार सारा वृत्तान्त सुनाया ॥१४५॥