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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक २३ और कहा कि 'मैंने विद्या के प्रभाव से यह जान लिया कि मेरी कन्या यहाँ आई है और सब भी मैं जानता हूँ ॥१४६॥ यह कुमार नरवाहनदत्त जब चक्रवर्ती होगा तब इसको भी ऐसा विमान होगा। आप लोग कुछ ही समय में रत्नप्रभा के साथ अपने पुत्र को यहाँ आया हुआ देखोगे ॥१४७-१४८॥ 'इस समय हम लोगों को जाने की आज्ञा दो इस प्रकार वत्सराज से निवेदन करके और उसकी आज्ञा प्राप्त करके अपनी विद्या के प्रभाव से विमान की रचना करके पुत्र के साथ उस विमान में लज्जा से नीचा मुँह किये हुए नरवाहनदत्त को उसके मित्र गोमुख आदि के साथ विमान में बिठाकर और वत्सराज के द्वारा प्रेषित यौगन्धरायण को साथ लेकर हेमप्रभ अपने काञ्चनशृंग नगर को गया ॥१४९-१५१॥ नरवाहनदत्त ने भी सुवर्णमय और सोने की चारदीवारी से घिरे हुए श्वसुर के नगर को देखा जो चारों ओर निकलती हुई प्रकाश की किरणों से ऐसा शोभित था मानो जामाता के स्नेह से अपने हाथों को ऊंचा करके फैलाये हुआ था ॥१५२ १५३॥ उस नगर में पहुँचकर राजा हेमप्रभ ने शास्त्र-विधि के अनुसार नरवाहनदत्त को अपनी कन्या इस प्रकार दी जैसे समुद्र ने विष्णु को लक्ष्मी दी थी ॥१५४॥ कन्या के साथ उसने रत्नों के चमकते हुए ढेर दहेज में दिये जो अनेक विवाहों में प्रज्वलित अग्नियों का भ्रम उत्पन्न कर रहे थे ॥१५५॥ समस्त कांचनपुर नगर में विवाह का उत्सव इस प्रकार हुआ कि ध्वजा (पताका) वाले घर भी ऐसे नृत्य रहे थे मानों राजा से वस्त्र प्राप्त किये हुए हों ॥१५६॥ नरवाहनदत्त विवाहोत्सव के हो जाने पर पत्नी रत्नप्रभा के साथ दिव्य भोगों का भोग करता हुआ उस नगर में रहने लगा ॥१५७॥ वह उस नगरी के दिव्य बाग-बगीचों वापियों और देव-मन्दिरों में विहार करता था और विद्या के प्रभाव से रत्नप्रभा के साथ आकाश में भी विचरण करता था ॥१५८॥ इस प्रकार, पत्नी के साथ नरवाहनदत्त ने उस विद्याधरों के नगर में कुछ दिनों तक रहकर अपने पिता के पास जाने के लिए यौगन्धरायण के साथ सम्मति की ॥१५९॥