कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टम लम्बक १६३ रक्त-रूपी जल से भरी हुई युद्ध-भूमि ही केवल लाल नहीं हुई, प्रत्युत सन्ध्या के कारण आकाश भी लाल हो गया ॥ ९१ ॥ तदनन्तर भूत-प्रेत मृत-कबन्धों¹ के साथ आनन्द-नृत्य करने लगे और दोनों ओर की सेनाएँ भी युद्ध समाप्त करके अपने-अपने शिविरों को लौट गईं ॥९२॥ उस दिन के युद्ध में श्रुतशर्मा की सेना के तीन वीर मारे गये और सूर्यप्रभ की सेना के छब्बीस वीर काम आये ॥९३॥ इस प्रकार, बन्धुओं मित्रों और वीर सैनिकों के मारे जाने के कारण विप्रचित्त सूर्यप्रभ उस रात्रि को रानियों के बिना ही रह गया ॥९४॥ और, निद्रा-रहित होकर युद्ध-सम्बन्धी आवश्यक विचार करते हुए उसने रात्रि व्यतीत की ॥९५॥ रानियों द्वारा सूर्यप्रभ की तथा युद्ध की चर्चा उसी रात में मृत बन्धुओं के कारण दुःखित और एक दूसरे को आश्वासन देने के लिए आई हुई उसकी पत्नियाँ भी एक स्थान पर आकर मिलीं ॥९६॥ उस शोक मनाने और रात बीतने के समय में भी वे विभिन्न प्रकार की बातें परस्पर करने लगीं। स्त्रियों का ऐसा कोई भी क्षण नहीं जाता जिसमें वे अपनी या पराई चर्चा न करें ॥९७॥ इसी प्रकार की चर्चा के प्रसंग में एक राजकुमारी बोली—आश्चर्य है कि आज आर्यपुत्र (सूर्यप्रभ) अकेले कैसे सो गये ? ॥९८॥ यह सुनकर दूसरी ने कहा—'युद्ध में अपने प्रिय व्यक्तियों की मृत्यु हो जाने के कारण दुःखित आर्यपुत्र पत्नियों के साथ आमोद-प्रमोद कैसे करते ? ॥९९॥ यह सुनकर तीसरी बोल उठी—यदि आज ही उन्हें नवीन सुन्दरी कन्या मिल जाती तो वे सारे स्वजनों का दुःख भूल जाते ॥१००॥ तब चौथी ने कहा कि यद्यपि आर्यपुत्र स्त्रियों में अधिक आसक्ति रखते हैं किन्तु ऐसे कष्ट के समय वे ऐसा कार्य कैसे कर सकते हैं ?। वे सब परस्पर जब इस प्रकार की बातें कर रही थीं तब एक स्त्री ने आश्चर्य के साथ कहा—यह तो बताओ कि हमारे आर्यपुत्र भला इतने स्त्री-लम्पट क्यों हैं ? ॥१०१–१०२॥ बहुत-सी स्त्रियों के रहते हुए भी वे दिन-रात नई-नई स्त्रियों को ही ग्रहण करके सन्तुष्ट होते हैं ॥१०३॥ यह सुनकर उनमें से एक चतुरा मनोवती नाम की स्त्री बोली—'सुनो राजा लोग बहुत पत्नियोंवाले क्यों होते हैं यह मैं बताती हूँ ॥१०४॥ १. सिर से रहित धड़ = मृत कलेवर।