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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक २५ तदनन्तर सास के द्वारा मंगल-विधान करने पर और ससुर के द्वारा सम्मानित किया गया नरवाहनदत्त पुत्र (साले) के सहित अपने ससुर के साथ अपनी पत्नी और मित्रों को लिये हुए विमान पर बैठकर कौशाम्बी की ओर चला ॥१६०॥ और, शीघ्र ही वत्सराज से किये गये उत्सव से अलंकृत राजधानी में माताओं की आँखों के लिए अमृत प्रवाहित करता हुआ नरवाहनदत्त अपने ससुर, साले और पत्नी रत्नप्रभा एवं अपने साथियों के साथ पहुँचा ॥१६१॥ वासवदत्ता के साथ उदयन ने भी पैरों पर गिरते हुए पुत्र और पुत्रवधू का अभिनन्दन किया और अपने विभव के अनुरूप अपने नये सम्बन्धी हेमप्रभ और उसके पुत्र वज्रप्रभ का स्वागत- सत्कार किया ॥१६२॥ तदनन्तर हेमप्रभ के उदयन से आज्ञा लेकर पुत्र के साथ आकाश में उड़कर अपने नगर को विदा होने पर, वह नरवाहनदत्त मदनमंचुका और रत्नप्रभा के साथ अपने मित्रों से मिलकर सुख से दिन बिताने लगा ॥ १६३-१६४ ॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का प्रथम तरंग समाप्त द्वितीय तरंग रत्नप्रभा की कथा (क्रमशः) इस प्रकार, विद्याधर-जाति की रत्नप्रभा नामक नई पत्नी को प्राप्त करके आनन्द का उपभोग करते हुए नरवाहनदत्त से मिलने के लिए उसके गोमुख आदि मित्र एक दिन प्रातः काल आये और रनिवास के द्वार पर खड़े हुए ॥१-२॥ द्वारपालिका के द्वारा कुछ समय तक रोके जाकर और फिर सूचना देकर भीतर प्रवेश पाने पर नरवाहनदत्त द्वारा उनका स्वागत-सत्कार किया गया। उसके बाद रत्नप्रभा ने द्वार- पालिका से कहा—'तुम अब इन लोगों को द्वार पर रोका न करो ये आर्यपुत्र के मित्र और हमारे ही अंग हैं ॥३-४॥ ४