भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बक ३७९ दोनों पैदल वीरों ने रथ में बैठे हुए दम और नियम के सारथी को मारकर और धनुष को काटकर दोनों को व्याकुल कर दिया ॥८३॥ दम और नियम दोनों भय से आकाश में उड़ने लगे। यह देखकर प्रहस्त और कुंजरकुमार भी अस्त्रों को लिये हुए आकाश में उड़े। सूर्यप्रभ ने भी तुरन्त महाबुद्धि और अचलबुद्धि नाम के दो महारथियों को सारथी बनाकर उनके लिए दो रथ भेजे ॥८४-८५॥ प्रहस्त और कुंजरकुमार ने माया से अदृश्य हुए दम और नियम को सिद्धांजन लगाकर देखा और उन्हें बाणों से बींध डाला। यह देखकर वे दोनों विद्याधर भाग गये। उधर, प्रभास उन बारह महावीरों से लड़ रहा था। उसने बार-बार उनके धनुष काट डाले। उधर से प्रहस्त ने आते ही उन बारहों के सारथियों को और कुंजरकुमार ने उनके घोड़ों को मार डाला ॥८६-८९॥ तब रथहीन वे बारहों अतिरथियों के नेता उन तीन वीरों की मार से व्याकुल होकर और मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए ॥९०॥ तब क्रुद्ध क्रोध और लज्जा से व्याकुल श्रुतशर्मा ने दो अन्य अतिरथियों के नेताओं को युद्ध के लिए भेजा ॥९१॥ उनमें एक चन्द्रकूट गिरि के स्वामी के क्षेत्र में चन्द्रमा से उत्पन्न और चन्द्रमा के ही समान सुन्दर चन्द्रगुप्त नाम का विद्याधर था। और दूसरा सुरंवराध्वज के क्षेत्र में उत्पन्न अत्यन्त तेजस्वी अपांगम नाम का विद्याधर था। वे दोनों श्रुतशर्मा के सचिव थे ॥९२-९३॥ वे भी बाणों की वर्षा करके प्रभास आदि से रथहीन किये गये रणभूमि को छोड़कर भाग गये ॥९४॥ तदनन्तर मनुष्यों और असुरों के विजय-गर्जना करने पर श्रुतशर्मा स्वयं चार महारथियों के साथ युद्धभूमि में सामने आया ॥९५॥ वे चारों महारथी त्वष्टा भग अर्यमा और पूषा देवताओं के अंश से उत्पन्न महीप आरोहण उत्पात और वैश्रवत् नाम के थे ॥९६॥ वे चारों मलय आदि पर्वतों के राजा चित्रपाद आदि के क्षेत्र में उत्पन्न हुए थे और प्रसिद्ध पराक्रमी थे ॥९७॥