कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextसप्तम लम्बक २७ पतिव्रत्य पर ऐसी सङ्कल्प न होनी चाहिए—ऐसा मेरा विचार है। द्वारपालिका को ऐसा कहकर उसने अपने पति से कहा—'आर्यपुत्र ! इस प्रसंग में मैं कहती हूँ सुनो। स्त्रियों की रक्षा और नियन्त्रण का मैं सूक्ष्म नीति समझती हूँ या ईर्ष्या अथवा अज्ञानवश उसमें कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। स्त्रियों का गहन चर तथा अन्य सम्भाषण से ही हानि होती है। पंचेन्द्रियवशकरण के बिना तो ब्रह्मा भी समर्थ नहीं हैं। मदोन्मत्ता नारी और नदी का नियमन कौन कर सकता है ! ॥५–८॥ राजा रत्नाधिप की कथा मैं इस सम्बन्ध में एक कथा कहती हूँ सुनो— गङ्गा के बीच में रत्नकूट नाम का एक विख्यात द्वीप है। वहाँ महा उत्साही और परम विष्णुभक्त पराक्रमसागर रत्नाधिपति नाम का राजा था। वह राजा पृथ्वी के सभी राजाओं की कन्याओं के साथ विवाह करता हुआ सारी पृथ्वी का विजय करने के लिए नित्य मन्त्रणा सलाह करने लगा॥ —११॥ उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने स्वयं दर्शन देकर कहा—'राजन् ! मैं तेरे तप पर प्रसन्न हूँ। जो कहता हूँ उसे सुनो—॥१२॥ कलिङ्ग देश में कार्पटिकेश्वर के मन्दिर पास श्वेत हाथी के रूप में उत्पन्न हुआ है। वह श्वेतभीम के नाम से प्रसिद्ध है ॥१३॥ वह हाथी दुर्जय की मन्त्रसिद्धि के कारण और मेरी भक्ति के कारण सभी कामरूपधारियों और दुर्धरत्व का अन्त करवाता है ॥१४॥ मैं तेरे स्वप्न में उसे कहता हूँ कि वह ब्राह्मण-धर्मी का रूप धरकर तुम्हारा दर्शन करेगा ॥१५॥ तू सवेरे हाथी का रूप बनाए उस ब्राह्मण के दर्शन से ही कृतकृत्य हो जाओगे व बहुत-सा धन देकर फिर शहर में लौटाकर उस ब्राह्मण के साथ हाथी का पूजन और दर्शन सदा करना ॥१६॥ फिर राजा जागकर उठा और प्रातः उठकर विधिपूर्वक उसने ब्राह्मण रूप श्वेतहस्ती के दर्शन किए ॥१७॥ राजाने उसका बहुत-सा पूजन कर उसे विदा किया और फिर उसने श्वेत हाथी का बहुत-सा पूजन किया और हाथी के प्रभाव से उसने सारी पृथ्वी को अपने वश किया