कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादश लम्बक १८७ षष्ठ तरंग सूर्यप्रभ-चरित तदनन्तर, रात्रि में पत्नियों के बिना सोया हुआ और युद्ध के लिए उत्साहित सूर्यप्रभ शय्या पर लेटे-लेटे अपने मन्त्री वीतभीति से बोला—'मित्र मुझे नींद नहीं आ रही है, इसलिए सात्त्विक वीरता से भरी कोई कहानी सुनाओ ॥१-२॥ उस वीतभीति ने सूर्यप्रभ की बात सुनकर 'जो आज्ञा' कहकर यह कहानी आरम्भ की ॥३॥ गुणशर्मा ब्राह्मण की कथा उज्जयिनी नाम की एक नगरी इस पृथ्वी का श्रृंगारस्वरूप है। वह निर्मल गुणों¹ से गूँथी गई रत्नावली के समान है ॥४॥ उस नगरी में गुणियों का प्यारा महासेन नाम का एक राजा था। वह कलाओं का प्रधान आधार था और प्रताप में सूर्य तथा शील में चन्द्रमा के समान था ॥५॥ उस राजा की प्राणों के समान प्यारी अशोकवती नाम की रानी थी जिसके समान सुन्दरी स्त्री तीनों लोकों में नहीं थी ॥६॥ उस महारानी के साथ राज्य का शासन करते हुए उस राजा का गुणशर्मा नामक आदरणीय और प्यारा मित्र था ॥७॥ वह गुणशर्मा शूर, धीर और अति रूपवान् वेद-विद्याओं का पारगामी युवक और कलाओं तथा शस्त्र-विद्याओं का ज्ञाता था ॥८॥ एक बार, रनिवास में नृत्य-कला की चर्चा के प्रसंग में राजा और रानी ने पास में बैठे हुए गुणशर्मा से कहा—॥९॥ तुम सर्वज्ञ हो इसमें सन्देह नहीं किन्तु हम दोनों के मन में एक कौतुक उत्पन्न हो रहा है कि यदि तुम नाचना जानते हो तो कृपा करो और अपना नृत्य दिखलाओ ॥१०॥ यह सुनकर मुस्कुराते हुए गुणशर्मा ने राजा और रानी से कहा—'जानता हूँ किन्तु राज सभा में नाचना उचित नहीं। ऐसा नाच मूर्खों का होता है और वह हँसी का कारण होता है। शास्त्र से भी निन्दित है फिर, वह भी राजा और रानी के सामने। यह लज्जा का विषय है। धिक्कार है! रानी के कौतूहल से प्रेरित राजा इस प्रकार कहते हुए गुणशर्मा से फिर बोला ॥११-१३॥ १ गुण—डोरा या सूत।