भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बक ४०५ यदि उस समय मेरी सेविका वहाँ न आती तो वह पापी अवश्य ही मेरा चरित्र भ्रष्ट कर देता। ॥११९॥* इस प्रकार की मिथ्या बातें बनाकर रानी चुप हो गई और रोने लगी सच है पहले झूठ की उत्पत्ति हुई और उसके उपरान्त दुष्ट स्त्रियों की। यह सुनते ही राजा क्रोध से जल उठा क्योंकि स्त्रियों की बातों पर विश्वास करने पर बड़े-बड़े विवेकयों का विवेक नष्ट हो जाता है॥१२०-१२१॥ और, राजा रानी से कहने लगा-'सुन्दरि, धैर्य रखो। मैं उस द्रोही का वध अवश्य करूँगा ॥१२२॥ किन्तु, उसे युक्ति से मारना होगा नहीं तो निन्दा होगी। यह बात प्रसिद्ध है कि उसने पाँच बार मुझे जीवन-दान दिया है ॥१२३॥ इसका यह अपराध जन-समाज में घोषित नहीं किया जा सकता। राजा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर रानी ने राजा से फिर कहा—'यदि यह दोष अगोपनीय¹ है तो क्या यह नहीं घोषित किया जा सकता कि वह 'वीरेश्वर से मित्रता करके राजद्रोह करता था' ॥१२४ १२५॥ रानी के इस सुझाव पर हाँ ठीक कहा'—इस प्रकार कहकर राजा सभा-भवन में चला आया ॥१२६॥ राजा के सभा में आने पर उसके दर्शन के लिए सामन्त राजा राजकुमार, मन्त्री तथा सचिव आदि सब वहाँ आये ॥१२७॥ उधर गुणशर्मा भी अपने घर से सभा में उपस्थित होने के लिए चला। उसने आते हुए मार्ग में अनेक तरह के अपशकुन देखे ॥१२८॥ उसकी बाईं ओर कौआ उड़ रहा था और कुत्ता बाईं ओर से दाहिनी ओर गया। साँप बाँये से बाईं ओर गया और कन्धे के साथ उसकी बाईं भुजा भी फड़कने लगी ॥१२९॥ 'सचमुच अपशकुन हो रहे हैं, इनका जो भी अशुभ फल होना है मुझे हो किन्तु मेरे स्वामी (राजा) का भला हो' ॥१३ ०॥ मन में ऐसा सोचता हुआ गुणशर्मा दरबार में आ पहुँचा। उसके हृदय में यह शंका थी कि राजगृह में कहीं अनिष्ट न हो ॥१३१॥ प्रणाम करके बैठे हुए गुणशर्मा की ओर राजा ने अच्छी दृष्टि से नहीं देखा और न उसका मौखिक स्वागत ही किया। प्रत्युत क्रोध के कारण तिरछी और पैनी दृष्टि से राजा उसे देखता रहा ॥१३२॥ आज यह क्या बात है' इस प्रकार अपने मन में गुणशर्मा जब सोच ही रहा था कि वह राजा अपने आसन से उठकर गुणशर्मा के कन्धे पर जा बैठा ॥१३३॥ १ प्रगट न करने के योग्य।

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