भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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[Header] मदन मञ्चक ५३१

अपने नाम से प्रसिद्ध और अपने ही बनाये हुए उस नगर को देखता हुआ वह राजा उसी मार्ग से जा निकला जिस मार्ग पर विजयवर्मा का घर था ॥३४६॥ राजा को उस मार्ग से आते हुए जानकर उसे देखने के कौतूहल से अनंगप्रभा अपने भवन के छत पर जा चढ़ी ॥३४७॥

अनंगप्रभा और मदनप्रभ की कथा

राजा को देखकर उस पर इस प्रकार आकृष्ट हुई कि वह राजा की हस्तिनी पर चढ़े हुए महावत से बलपूर्वक कहने लगी-॥३४८॥ 'हे हाथीवान मैं हाथी पर कभी नहीं चढ़ी हूँ। इसलिए, तुम मुझे चढ़ा लो जिससे मैं भी जानूँ कि हाथी पर चढ़ने से क्या सुख होता है ॥३४९॥ यह सुनकर महावत जब राजा का मुँह देखने लगा तब राजा ने भी पृथ्वी पर स्वर्ग से गिरी हुई चन्द्रमा की कान्ति के समान सुन्दरी अनंगप्रभा की ओर देखा ॥३५०॥ और, चकोर के समान उसे अतृप्त नेत्रों से पीता हुआ राजा उसने पाने की लालसा से महावत को कहने लगा-हस्तिनी को पास लेजाकर इसकी इच्छा पूर्ण करो। इस चन्द्रमुखी को शीघ्र ही हाथी पर बैठाओ ॥३५१ ३५२॥ राजा के इस प्रकार कहने पर महावत द्वारा चलाई गई हस्तिनी उसी समय उस घर के नीचे आ गई ॥३५३॥ हस्तिनी को घर के समीप आई हुई देखकर अनंगप्रभा ने अपने को (जान-बूझकर) राजा की गोद में गिरा दिया ॥३५४॥ उस कहाँ तो पहले पति बनाने में ही द्वेष था और यहाँ अब नये-नये पतियों से भी तृप्ति नहीं होती । सच है कि माता-पिता के शाप से कितना उलट-फेर हो गया ? ॥३५५॥ गिरने का भय दिखाकर वह अनंगप्रभा राजा के गले से चिपट गई । राजा भी उसके शरीर स्पर्श-रूपी अमृत से सिक्त होकर परम आनन्द को प्राप्त किया ॥३५६॥ बड़ी युक्ति से अपने को राजा की गोद में डालती हुई और गले से लिपटकर उसका चुम्बन करने की इच्छा रखनेवाली उस अनंगप्रभा को लिए हुए राजा शीघ्र अपने महल में आया ॥३५७॥ महल में आकर अपना कृतार्थ मानता हुआ उस विद्याधरी को राजा ने अपने रनिवास में ले जाकर उसी समय उसे अपनी महारानी बना लिया ॥३५८॥ विजयवर्मा ने घर पर आकर और राजा द्वारा अनंगप्रभा का अपहरण जानकर अपने क्षत्रियपन की आन में आकर राजभवन के बाहर उत्तर राजा से युद्ध प्रारम्भ कर दिया ॥३५९॥ और युद्ध में पीठ न दिखाकर वहीं उसने अपना शरीर त्याग दिया क्योंकि उच्च लोग स्त्री के कारण होनेवाले अपमान को सहन नहीं करते ॥३६०॥