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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ५५३ जिस नीतिमान के कृपाण में तीक्ष्णता थी दंड में नहीं। धर्म में जिसको निरन्तर आसक्ति थी स्त्री मद्य और आखेट में नहीं। ॥८७॥ गुण का टूटना केवल धनुषों में ही देखा जाता था अन्यत्र गुणक्षय नहीं था। अ-विचार (मेढ़ों का चराना) केवल पशु चरानेवालों में देखा जाता था अन्यत्र अ-विचार नहीं था॥८८॥ उस राजा के पास एक बार सुन्दर और भव्य स्वरूपवाला मालव-देशवासी ब्राह्मण सेवा (नौकरी) के लिए आया ॥८९॥ उसकी धर्मवती नाम की पत्नी वीरवती नाम की कन्या और सत्त्ववर नाम का बालक था। इस प्रकार इतना ही उसका परिवार था ॥९०॥ इसी प्रकार, उसके पास सेवा के तीन साधन थे—कमर में कृपाण और एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में शीशे के समान चमकती हुई ढाल ॥९१॥ केवल इतने ही बड़े कुटुम्ब के लिए उसने राजा से पाँच सौ दीनार प्रतिदिन का वेतन माँगा ॥९२॥ राजा ने भी उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण 'उसकी विशेषता देखें'—ऐसा सोचते हुए उसे उतना ही वेतन देना स्वीकार कर लिया ॥९३॥ तदनन्तर राजा ने उसके पीछे गुप्तचर लगा दिये कि देखो यह दो हाथोंवाला इतनी मुहरों को कैसे खर्च कर सकता है ? वह वीरवर उन पाँच सौ मुहरों में से एक सौ मुहरें अपने भोजन आदि की व्यवस्था के लिए अपनी पत्नी को देता था। एक सौ से कपड़े माला आदि खरीदता था एक सौ मुहरें प्रतिदिन स्नान करके विष्णु शिव आदि के पूजन में व्यय करता था और शेष दो सौ मुहरें, प्रतिदिन वह ब्राह्मण और दीन भिक्षुकों को दान देता था। इस प्रकार, वह प्रतिदिन पाँच सौ दीनार व्यय करता था ॥९४–९७॥ वीर, प्रातःकाल से मध्याह्न तक वह प्रतिदिन राजभवन के मुख्य द्वार पर खड़ा रहता था। तदनन्तर स्नान भोजन आदि करके शेष दिन और रात में फिर द्वार पर पहरा देता था ॥९८॥ राजा के गुप्तचर उस ब्राह्मण की प्रतिदिन की इस दिनचर्या की सूचना नित्य राजा को दिया करते थे ॥९९॥ कुछ दिनों के पश्चात् सन्तुष्ट राजा ने उससे गुप्तचरों को हटा लिया। वह वीरवर भी स्नान भोजन आदि के समय को छोड़कर दिन-रात तलवार लिये द्वार पर राजा की सेवा में डटा रहता था॥१००॥ कुछ दिनों के उपरान्त मानो वीरवर को जीतने की इच्छा से वीरों के प्रताप को न सहने वाला वर्षाकाल प्रचंड गर्जना करता हुआ आया ॥१०१॥ ७

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