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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक १३३

इतने में ही शिकार से लौटे हुए भील उस मार्ग से आ निकले और उन्होंने अच्छे लक्षणों से सम्पन्न राजा को वहाँ सोये हुए देखा ॥२१९॥ तब वे उसे बलिदान के योग्य समझकर देवी को भेंट करने के लिए बाँधकर अपने राजा मुक्ताफल के पास ले गये। वह भील सरदार भी उस अच्छे रूपवाला जानकर पशु बनाने के लिए विन्ध्यवासिनी के मन्दिर में ले गया ॥२२०-२२१॥ देवी का दर्शन करते ही राजा ने उसे प्रणाम किया और देवी की कृपा तथा स्वामी कार्त्तिकेय के वरदान के कारण उसी समय वह बन्धन से छूट गया। यह देखकर और उसे देवी की अद्भुत और आश्चर्यजनक कृपा समझकर भील-सरदार ने राजा का वध न करके उसे मुक्त कर दिया ॥२२२ २२३॥ इस प्रकार अपमृत्यु के तीसरे दौर से छूटे हुए राजा के शाप का एक वर्ष व्यतीत हो गया ॥२२४॥ तबतक राजा को ढूँढ़ती वह नागिन पुत्र-सहित रानी मदनसुन्दरी को लाकर उपस्थित हुई ॥२२५॥ और उससे बोली—'हे राजन्, कुमार के शाप को जानकर मैंने तुम्हारी पत्नी और पुत्र को युक्ति से अपने घर ले जाकर सुरक्षित रखा था। अब तुम इन दोनों को लो और शाप से मुक्त होकर अपनी भूमि के राज्य का उपभोग करो। इस प्रकार कहकर, और प्रणाम करते हुए राजा को आशीर्वाद देकर वह नागिन अन्तर्हित हो गई। राजा ने भी पत्नी और पुत्र के उस मिलने को एक सपना-सा समझा ॥२२६-२२८॥ तदनन्तर, चिरकाल के वियोग के उपरान्त मिलकर आलिंगन करते हुए राजा और रानी का वियोग-कष्ट प्रसन्नता के आँसुओं के साथ बह निकला ॥२२९॥ तब भीलों का सरदार मुक्ताफल ने उसे राजा कनकवर्ष समझकर पैर पर गिर पड़ा और उससे क्षमा माँगी। तदनन्तर पत्नी तथा पुत्र-सहित उसे अपने ग्राम में ले जाकर समुचित साधनों से उसकी सेवा करने लगा ॥२३०-२३१॥ वहाँ रहते हुए राजा ने दूत द्वारा अपने स्वपुर देशभक्ति को तथा अपनी सेना को वहीं बुलवा लिया ॥२३२॥ उन सब के आने पर राजा कनकवर्ष स्वामी कार्त्तिकेय के कहे हुए हिरण्यवर्म नाम के पुत्र के साथ रानी मदनसुन्दरी को हस्तिनी पर बैठाकर और आप रथपर मयूराक्ष जाने के लिए वहाँ से चला ॥२३३॥ ८