कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम लम्बक ५९९ सारी पृथ्वी पर ढूँढ़ते हुए राजा भीम को भी राजा नल के सिवा अपनी कन्या के योग्य दूसरा पति नही मिला ॥२४ ॥ इसी बीच एक बार राजा भीम की कन्या दमयन्ती जलक्रीड़ा के लिए एक तालाब में उतरी ॥२४१॥ उस सरोवर में उसने कमल की नाल को खाते हुए एक राजहंस को युक्ति से अपनी चादर फेंककर पकड़ लिया ॥२४२॥ उससे इस प्रकार पकड़ा गया वह दिव्य राजहंस मनुष्यों की वाणी में उससे कहने लगा- 'हे राजकुमारी मैं तेरा उपकार करूँगा। मुझे छोड़ दे। निषध देश का राजा नल है। अच्छे गुणों से गूँथे हुए हार के समान जिसे दिव्य रमणियाँ भी हृदय में धारण करती हैं ॥२४३-२४४॥ तू उसके समान पत्नी है और वह तेरे समान पति है। अतः यह समान पति-पत्नी-संयोग कराने में मैं तेरा प्रणय-दूत बनूँगा' ॥२४५॥ यह सुनकर और उस दिव्य हंस को सत्य बोलनेवाला समझकर, दमयन्ती ने 'ठीक है, तुम दूत बनो' यह कहते हुए उसे छोड़ दिया ॥२४६॥ और बोली कि 'मैं नल के सिवा दूसरे को नहीं करूँगी क्योंकि उसने कान के मार्ग से प्रविष्ट होकर, मेरा मन हर लिया है' ॥२४७॥ उस हंस ने वहाँ से चलकर शीघ्र ही जलक्रीडा में लगे हुए नलवाले सरोवर का आश्रय लिया ॥२४८॥ राजा नल ने भी उस मनोहर राजहंस को देखकर खिलाड़ के साथ फेंके हुए अपने दुपट्टे से उसे बाँध लिया ॥ २४९॥ तदनन्तर, वह हंस उससे बोला-'राजन् मुझे छोड़ दो। मैं तो तुम्हारे उपकार के लिए ही यहाँ आया हूँ। सुनो तुम्हें कहता हूँ—॥२५ ॥ विदर्भ देश में राजा भीम की पृथ्वी की तिलोत्तमा और देवताओं से भी चाही जानेवाली दमयन्ती नाम की कन्या है॥२५१॥ मेरे द्वारा तेरे गुणों का बखान करने पर तुझमें सुदृढ़ प्रेम रखनेवाली उस दमयन्ती ने तुझे ही अपने पति के रूप में वरण किया है। यही कहने के लिए मैं आया हूँ' ॥२५२॥ इस प्रकार शुभ फल को प्रकट करनेवाले हंस के वचनों से और कामदेव के पुष्प-बाणों से वह राजा नल एक साथ ही बिंध गया ॥२५३॥ और उस हंस से बोला-हे पक्षिश्रेष्ठ मैं धन्य हूँ मूर्तिमती मनोरथ-सम्पत्ति के समान जिसने मुझे वरण कर लिया है' ॥२५४॥