भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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आश्चर्यजनक रथ की ध्वनि को सुनकर नल के आने की सम्भावना करती हुई दमयन्ती हृदय से प्रसन्न हुई ॥३९०॥ तदनन्तर उसने वास्तविक बात जानने के लिए उसके पास एक दासी को भेजा। वह दासी सब जानकर नल के लिए उत्सुक दमयन्ती से बोली—॥३९१॥ हे देवि मैंने जाकर पता लगाया कि यह राजा ऋतुपर्ण तेरे झूठे स्वयंवर का निमन्त्रण पाकर आया है। उसे ह्रस्वबाहु नाम का सारथी एक दिन में ही यहाँ ले आया है। क्योंकि वह रथ-संचालन-विज्ञान का विशेषज्ञ है॥३९२-३९३॥ तो मैंने रसोईघर में जाकर उस रसोइए को देखा। वह काले रंग और विकृत रूप का कोई व्यक्ति है॥३९४॥ उसका चमत्कार मैंने देखा कि उसने चावलों में पानी नहीं डाला था किन्तु उसमें स्वयं पानी आ गया लकड़ियों में आग न लगाने पर भी लकड़ियाँ अपने-आप जल उठीं और पलक मारते ही उसने अनेक प्रकार के दिव्य भोजन तैयार कर दिये। यह सब देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और मैं यहाँ आई ॥३९५-३९६॥ दासी के मुँह से यह सब सुनकर दमयन्ती सोचने लगी— अग्नि और जल जिसके वश में हों और जो रथ-विद्या के रहस्य को जानता है, आर्यपुत्र (नल) इतना विकल कैसे हो गया। मैं समझती हूँ मेरे वियोग से पीड़ित होने के कारण ऐसा हुआ होगा। तो मैं अब उसी से पूछती हूँ ॥३९७-३९८॥ ऐसा सोचकर दमयन्ती ने उस दासी के साथ आने वाले बच्चों को नल के पास भेजा ॥३९९॥ उन्हें देखकर और दोनों बच्चों को गोद में रखकर बहुत समय तक धारा प्रवाह आँसू बहाते हुए नल मौन रोता रहा ॥४००॥ कुछ समय बाद वह चेटी (दासी) से बोला—ऐसे ही मेरे दो बच्चे अपने नाना के घर में हैं। उन्हें स्मरण करके मुझे दुःख हुआ ॥४०१॥ तब उस दासी ने उन बच्चों के साथ लौटकर दमयन्ती को सारा समाचार सुनाया। तब दमयन्ती का भी पूर्ण विश्वास हो गया ॥४०२॥ दूसरे दिन प्रातःकाल उसने दासी को आज्ञा दी कि तू जाकर राजा ऋतुपर्ण के रसोइए से कह दे—॥४०३॥ कि मैंने सुना है तेरे समान दूसरा कोई रसोइया नहीं है अतः आज तू मेरे यहाँ आकर भोजन बना ॥४०४॥ ८२