भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक ७७१ इसने मुझे ताड़ लिया है अब तो इस अपने भक्त से क्या छिपाया जाय ? ऐसा सोचकर वह बोला—'सखे तेरे लिए कुछ छिपाने की बात नहीं है॥४९॥ जल के पास गये हुए मैंने एक अपूर्व शब्द सुना जो पहले कभी नहीं सुना था। वह शब्द मुझसे भी अधिक बल किसी प्राणी का था ॥५० ॥ क्योंकि वह प्राणी भी शब्द के ही अनुरूप होगा। ब्रह्मा की सृष्टि विचित्र है। उसमें एक-से-एक बढ़कर प्राणी हैं ॥५१॥ ऐसे प्राणी के मेरे इस वन में घुस आने पर यह शरीर और वन अब मेरे नहीं रहे। इसलिए, अब मुझे यहाँ से किसी दूसरे वन में चला जाना चाहिए' ॥५२॥ ऐसा कहते हुए सिंह से दमनक ने कहा—'स्वामिन् ! आप शूर हैं और अच्छे नेता (राजा) हैं, तो वन को क्यों छोड़ना चाहते हैं ? ॥५३॥ पानी के प्रवाह से पुल टूटता है और कानाफूसी से प्रेम टूटता है ! बिना रक्षा किये मन्त्र (नीति) फूट पड़ता है और कायर व्यक्ति केवल शब्द से ही टूट जाता है ॥५४॥ भेरी, शंख आदि के शब्द भी भयंकर होते हैं। इसलिए, वास्तविक बात को बिना जाने डरना नहीं चाहिए॥५५॥ नगाड़ा और सियार की कथा इस प्रसंग में आप 'नगाड़ा और एक सियार की कथा सुनें' । प्राचीन समय में किसी जंगल में एक सियार रहता था ॥५६॥ उसने भोजन की खोज में घूमते हुए पहले की पुरानी युद्ध-भूमि में पहुँचकर और उसके एक ओर से गम्भीर शब्द सुनकर डरते हुए उधर देखा। वहाँ उसने पहले कभी न देखे हुए और गिर कर भूमि में पड़े हुए एक नगाड़े को देखा। तब उसे देखकर उसने सोचा क्या यह इस प्रकार का शब्द करनेवाला कोई प्राणी है ? ॥५७-५८॥ ऐसा सोचता हुआ वह एकदम स्थिर पड़े हुए उस नगाड़े के पास गया और जब उसे भली भाँति देखा तब उसे मालूम हुआ कि यह कोई प्राणवाली वस्तु नहीं है॥५९॥ वायु से हिलते हुए सरकंडों के आघात से बोलते हुए नगाड़े के चमड़े के उस शब्द को सुनकर उस सियार ने भय छोड़ दिया ॥६० ॥ उसके भीतर कुछ खाने योग्य वस्तु मिलेगी इस प्रकार सोचकर, उसके चमड़े को उधेड़ कर जब उसने देखा तब तो उसे केवल लकड़ी और चमड़ा ही उसे दीखा ॥६१॥ अतः हे स्वामी आप-जैसे व्यक्ति भी क्या केवल शब्द से डरते हैं? यदि आप यहाँ भय का कारण समझते हैं तो मैं उसे जानने के लिए जाता हूँ ॥६२॥