भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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प्रथम सम्बंध ७८१ वह मूर्ख सिंह उस दूसरे सिंह पर आक्रमण करने की दृष्टि से उस कुएँ में कूद पड़ा और मर गया ॥१९५॥ इस प्रकार, उस शश ने अपनी मृत्यु को पार कर और अन्यान्य पशुओं को भी मृत्यु से बचाकर और उस जंगल के सभी पशुओं को यह शुभ समाचार सुनाकर उन्हें आनन्दित किया ॥१९६॥ 'इस प्रकार, बुद्धि ही वास्तविक बल है। शारीरिक बल उसके आगे कुछ नहीं है। जिस बुद्धि के प्रभाव से शश ने सिंह को भी मार डाला ॥१९७॥ इसलिए, मैं अपने इस कार्य को बुद्धि के बल से सिद्ध करता हूँ। दमनक के इस प्रकार कहने पर करटक चुप हो गया ॥१९८॥ तदनन्तर, दमनक अपने स्वामी सिंह के पास आकर उदास होकर बैठ गया। जब सिंह ने उसकी उदासीनता का कारण उससे पूछा तब उसने एकान्त में उससे कहा- 'स्वामी किसी बात को जानकर चुप नहीं बैठा जा सकता। इसलिए कहता हूँ कि सेवक का धर्म है स्वामी के हित को बिना अधिकार के भी कहे। इसलिए, आप इसे अन्यथा न समझकर मेरे निवेदन को सुनें ॥१९९-१११॥ यह संजीवक बैल तुम्हें मारकर इस वन का राज्य चाहता है। इसके मन्त्री हो जाने पर इसने निश्चय कर लिया है कि 'तुम डरपोक हो' ॥११२॥ वह तुम्हें मारने की इच्छा से अपने शस्त्र-रूपी सींगों को पैना करता रहता है और जंगल के जीवों को घूम-घूमकर धीरज दिलाकर यह समझाता रहता है कि 'घास खानेवाले मेरे जीते रहते तुम निर्भय रहो और मेरे साथ आओ और इस मांसभोजी सिंह को किसी प्रकार मार डालो। दमनक से इस प्रकार कहा गया पिंगलक बोला-'घास खानेवाला बेचारा यह बैल मेरा क्या कर सकता है? किन्तु यही एक बात है कि अभय दिये हुए और शरण में आये हुए इसे कैसे मारूँ? ॥११३-११५॥