कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextदशम लम्बक ४८१ यह सुनकर दमनक बोला- ऐसा न करना चाहिए। जिसे राजा अपने समान बनाता है, उसे राजा के समान ही राजलक्ष्मी नहीं प्राप्त होती। जब वे दोनों ही राजमद से उच्छृङ्खल हो जाते हैं तब चंचल लक्ष्मी दोनों ओर पैर रखकर अधिक समय तक नहीं ठहरती। और, उनमें से एक को अवश्य ही छोड़ देती है ॥११७-११८॥ जो स्वामी हितैषियों से भी द्वेष करता है और अहितचिन्तकों को ही सदा चाहता है, वह बुद्धि- मानों के लिए उसी प्रकार छोड़ देने के योग्य हो जाता है, जिस प्रकार वैद्य के लिए कुष्ट-रोगी ॥११९॥ प्रारम्भ में कड़वी और अन्त (परिणाम) में मधुर बातों का कहने और सुननेवाला जहाँ होता है, वहाँ लक्ष्मी निवास करती है ॥१२०॥ जो राजा सज्जनों की बात नहीं सुनता और दुर्जनों की बातों पर ध्यान देता है, वह शीघ्र ही विपत्ति में पड़कर पश्चात्ताप और सन्ताप करता है ॥१२१॥ हे स्वामी, उस बैल पर आपका स्नेह व्यर्थ है। इस द्रोही के लिए अभय-दान क्या और इस शरणागत की रक्षा कैसी ! ॥१२२॥ और भी बात है। सदा आपके पास रहनेवाले इस बैल के गोबर और गोमूत्र में कीड़े उत्पन्न होते हैं। वे कीड़े हाथियों के दांतों से हुए आपके घावों में प्रविष्ट होकर आपके शरीर को हानि पहुँचाते हैं। अतः उपाय द्वारा ऐसे व्यक्ति का वध करना ही उचित है ॥१२३-१२४॥ विद्वान् व्यक्ति यदि स्वयं कोई अपराध नहीं करता तो भी दुष्ट के संसर्ग से उसमें भी दोष उत्पन्न हो ही जाते हैं। इस प्रसंग में एक कथा सुनो¹ ॥१२५॥ मन्दविसर्पिणी जूँ और खटमल की कथा किसी राजा के पलंग में मन्दविसर्पिणी नाम की एक यूका (जूं) कहीं से जाकर छिपी रहती थी। एक बार सहसा वायु के वेग से उड़ाया गया टिट्टिभ नाम का एक खटमल उस पलंग में आकर घुस गया ॥१२६-१२७ ॥ उसे देखकर मन्दविसर्पिणी ने कहा-'तू मेरे रहने के स्थान में क्यों घुस आया ? कहीं दूसरे स्थान पर जा ॥१२८॥ १. इसी भाव का मुद्राराक्षस नाटक में आया हुआ श्लोक संस्कृत-टिप्पणी में द्रष्टव्य है।