भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक ७८५ मैं पहले कभी नहीं पिया हुआ राजा का रक्त-पान करूँगा इसलिए कृपा कर, और मुझे यहाँ रहने दे। इस प्रकार, उस खटमल ने जूँ से कहा ॥१२९॥ तब खटमल के अनुरोध से वह जूँ कहने लगी—'यदि ऐसा है तो रहो। लेकिन मित्र राजा को अनवसर (बे-मौके) न काटना। जब वह सोया हो या आनन्द-विलास में तन्मय हो तो धीरे से काटना। यह सुनकर वह टिट्टिभ खटमल ऐसा ही करूँगा कहकर वहीं रहने लगा ॥१३०-१३१॥ एक बार टिट्टिभ ने रात में सोये हुए राजा को शीघ्रता में जोर से काट लिया। तब राजा 'हाय ! काट लिया ! इस प्रकार कहकर उठ गया। इतने में उस दुष्ट खटमल के भागने पर और राजा के सेवकों के ढूँढ़ने पर उसे तो नहीं पाया किन्तु उस जूँ को पा लिया और उसे मसल डाला ॥१३२-१३३॥ इस प्रकार, टिट्टिभ नामक खटमल के सम्पर्क से बेचारी मन्दविसर्पिणी नामक जूँ मारी गई। अतः इस संजीवक का साथ तुम्हारे लिए कल्याणकारी नहीं होगा ॥१३४॥ यदि आप मेरा विश्वास नहीं करते हैं तो उसे स्वयं आये हुए देखेंगे कि वह क्रुद्ध के समान तीखे सींगों को घुमाता हुआ तुम्हारे सामने आयेगा ॥१३५॥ इस प्रकार, दमनक द्वारा डराये गये सिंह ने मन ही-मन संजीवक को मारने की सोच ली ॥१३६॥ सिंह के मन के भाव को समझकर दमनक वहाँ से चुपचाप खिन्न-सा होकर संजीवक के पास गया ॥१३७॥ 'कहो मित्र कैसे हो ? तुम्हारा शरीर तो ठीक है? बैल संजीवक के इस प्रकार पूछने पर दमनक उससे बोला-॥१३८॥ 'सेवक का क्या कुशल ? राजा का सदा प्यारा कौन रहा ? कौन याचक (माँगनेवाला) लघुता को प्राप्त नहीं होता और कौन मौत का शिकार नहीं होता ? ॥१३९॥ इस प्रकार कहते हुए दमनक से संजीवक ने फिर पूछा-आज तुम इस प्रकार की विरक्ति की बातें क्यों कर रहे हो ? ॥१४०॥ तब दमनक ने कहा-'सुनो। प्रेम के कारण तुमसे कहता हूँ। आज वह मृगराज (सिंह) निपट तुम्हारे विरुद्ध हो गया है। वह निरपेक्ष चंचल प्रेमवाला तुम्हें मारकर खाना चाहता है और मैं उसके हिंसक वृत्तिवाले सेवक साथियों को सदा तुम्हारे विरुद्ध प्रेरणा देते हुए देखता हूँ ॥१४१-१४२॥ ९९