भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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षष्ठम लम्बक ८३३ वह मूलराज यह सब सच मानकर प्रसन्न हो गया। इसी प्रकार, सीधे-सादे हृदयवाले लोग दुष्ट स्त्रियों द्वारा खेल-खेल में ही ठगे जाते हैं। 'महाराज तुमने अस्थिमूर्ख की कथा सुनी अब एक मूर्खा चण्डाली की कथा सुनो ॥२२३॥ मूर्खा चण्डालकन्या की कथा एक मूर्ख और सुन्दरी चंडालकन्या थी। उसने सबसे बड़े पति की प्राप्ति के लिए मन में संकल्प किया ॥२२४॥ उसने किसी समय नगर भ्रमण के लिए निकले राजा को देखकर उसे पति बनाने के लिए उसके पीछे चलना प्रारम्भ किया ॥२२५॥ इतने में ही उस मार्ग से एक मुनि आया। राजा उतरकर उसके चरणों में प्रणाम करके फिर हाथी पर सवार हो गया और चला गया ॥२२६॥ यह देखकर, उस मुनि को राजा से भी उत्तम समझकर, वह कन्या उस मुनि के पीछे चल पड़ी ॥२२७॥ उस मुनि ने भी मार्ग में जाय हुए एक शिवालय को देखा वहाँ भूमि पर घुटना टेककर शंकरजी को प्रणाम करके वह आगे की ओर चला ॥२२८॥ उस चंडालकन्या ने उस मुनि से भी शिवजी को उत्तम समझकर मुनि को छोड़ शिवलिंग को पकड़ लिया ॥२२९॥ कुछ ही समय पश्चात् वहाँ पर एक कुत्ते ने आकर और देवता के चबूतरे पर चढ़कर, टाँगें उठाकर अपनी जाति के स्वभाव का काम किया। (अर्थात्, शिवलिंग पर मूत्र-त्याग कर दिया) ॥२३०॥ यह देखकर उस चंडालिनी ने कुत्ते को शिवजी से भी उत्तम समझकर पति बनाने की इच्छा से उस कुत्ते का पीछा किया ॥२३१॥ वह कुत्ता अपने परिचित एक चंडाल के घर में घुसकर एक युवा चंडाल के पैरों में प्रेम से लोटने लगा ॥२३२॥ यह देखकर वह चंडालकन्या कुत्ते से भी अधिक अपनी जाति के चांडाल को बड़ा मान कर, अर्थात् उसे सब से बड़ा मानकर, पति बनाकर संतुष्ट हुई ॥२३३॥ गोमुख ने नरवाहनदत्त से कहा—'स्वामिन्, इस प्रकार बहुत ऊँचे चढ़ने की चेष्टा करनेवाले मूर्ख फिर अपने ही स्थान पर आकर गिरते हैं। इसी प्रसंग में एक मूर्ख कृपण राजा की कथा सुनो' ॥२३४॥ कृपण राजा की कथा एक मूर्ख राजा था। वह धनवान् होते हुए भी अति कृपण था। एक बार उसके हितैषी मन्त्रियों ने उससे कहा—'स्वामिन्, इस लोक में किया गया दान परलोक की दुर्दशा को दूर करता है। इसलिए, दान दो क्योंकि जीवन और धन दोनों नाशवान् हैं ॥२३५-२३६॥ यह सुनकर राजा कहने लगा कि मैं दान तब दूँगा जब मरकर अपने को कष्ट म पड़ा हुआ देखूँगा' ॥२३७॥ १५