कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक ८५१ तब शक्तियशा के लिए उत्सुक नरवाहनदत्त का मनोरंजन करने के लिए बुद्धिमान् मन्त्री गोमुख ने यह कथा कही ॥४॥ कौओं और उल्लुओं की कथा१ किसी जंगल में बहुत बड़ा वटवृक्ष था। जो पक्षियों के कलरव से मानों पक्षियों के विश्राम के लिए सदा उन्हें बुलाता रहता था ॥५॥ उस बरगद पर मेघवर्ण नाम का कौओं का राजा घोंसला बनाकर रहता था। अवमर्द्द नाम का उल्लुओं का राजा उसका शत्रु था ॥६॥ वह उलूकराज एकबार रात में आकर, बहुत-से कौओं को मारकर काकराज का अपमान करके चला गया ॥७॥ प्रातःकाल ही काकराज ने मन्त्रियों को बुलाकर उन्हें सत्कार करके कहा। उसके मन्त्री थे—उड्डीवी आदीवी संडीवी प्रदीवी और चिरजीवी ॥८॥ काकराज ने कहा—'वह हमारा शत्रु उलूकराज हमारा स्थान जानता है और बलवान् भी है। वह इस प्रकार आक्रमण करता ही रहेगा। उसका प्रतीकार सोचो ॥९॥ यह सुनकर उड्डीवी मन्त्री बोला—'स्वामिन् शत्रु यदि बलवान् है तो दूसरे देश में आश्रय लेना चाहिए या उससे ही अनुनय-विनय करनी चाहिए कि वह आक्रमण न करे' ॥१०॥ यह सुनकर आदीवी बोला—'अभी तत्काल उसका इतना भय नहीं है। शत्रु का आशय (अभिप्राय) और अपनी शक्ति को समझकर यथासम्भव यत्न करना चाहिए' ॥११॥ यह सुनकर संडीवी बोला—'स्वामिन् मरना अच्छा है या विदेश में जाकर जीवन बिताना अच्छा है। किन्तु, शत्रु के सामने झुकना अच्छा नहीं ॥१२॥ हमें हानि पहुँचानेवाले शत्रु के साथ युद्ध करना चाहिए। सहायकाकांक्षा शूर और उत्साही राजा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है' ॥१३॥ उसके पश्चात् प्रदीवी ने कहा—वह शत्रु बलवान् है युद्ध में उसे जीता नहीं जा सकता। इस समय उससे सन्धि करके फिर अवसर मिलने पर उसे मारना चाहिए' ॥१४॥ तब चिरजीवी ने कहा—'सन्धि का दूत कौन होगा और सन्धि ही क्या होगी। कौओं और उल्लुओं की शत्रुता सृष्टि के प्रारम्भ से ही चली आ रही है। हमारे बीच कौन पड़ेगा' ॥१५॥ यह काम मन्त्र से सिद्ध होनेवाला है क्योंकि राज्य का मूल मन्त्र ही है। यह सुनकर काकराज चिरजीवी से बोला- ॥१६॥ 'तुम वृद्ध हो सब जानते हो यह बताओ कि कौए और उल्लुओं में वैर किस कारण हुआ। उसके पश्चात् मन्त्र (सम्मति) बताना' ॥१७॥ १ पंचतन्त्र के तीसरे काकोलूकीय तन्त्र की कथा मूल यही कथा है।—अनु